फ़िल्मों की बहार उर्फ़ जाने कहां गए वो दिन – 1

8 years ago

जिस तरह पुराने हीरो अब हीरो नहीं रहे, एक दम ज़ीरो हो गए हैं या दादा-नाना बनकर खंखार रहे हैं,…

दो दशकों में सर्वाधिक उत्पादक रहा संसद का यह मानसून सत्र

8 years ago

वर्ष 2018 का संसद में मानसून सत्र 10 अगस्त को समाप्त हो चुका है. 10 अगस्त लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन…

चलो दिलदार चलो – एक म्यूजिक डायरेक्टर थे गुलाम मोहम्मद

8 years ago

साहिर लुधियानवी ने लिखा था - “ये बस्ती है मुर्दापरस्तों की बस्ती”. ताज़िन्दगी आदमी इस मुगालते में जीता है कि…

उत्तराखण्ड की एक बीहड़ यात्रा की याद – 3

8 years ago

रूद्रप्रयाग जा रही रोडवेज की खटारा बस की सीट के नीचे बैग रख रहा था कि कातर भाव से आकाश…

आम के नाम

8 years ago

आम तो बस आम है. इसका कोई जवाब नहीं. खास ही नहीं, आम आदमी का भी मनपसंद फल. देश भर…

समाचारों के प्रस्तुतीकरण के वैचारिक चरित्र

8 years ago

पत्रकारिता की पाठ्यपुस्तकों में यह बताया जाता है कि हर समाचार में ‘कौन’, ‘क्या’, ‘कब’, ‘कहां’, ‘क्यों,’ और ‘कैसे’- का…

कुमाऊं की रामलीला से कुछ झलकियां

8 years ago

कुमाऊं की रामलीला बहुत चर्चित रही है. देश को अनेक रंगकर्मी इस रामलीला ने दिए. बी एल शाह, बी एम…