बाबिल, जिसे गढवाल क्षेत्र में बाबड़ नाम से भी जाना जाता है, पहाड़ी क्षेत्रों में चट्टानों पर उगने वाली एक लटनुमा घास की प्रजाति है. चट्टानों पर उगने के कारण इसको हासिल करना भी जोखिमपूर्ण कार्य है. इसके पत्ते गोल, लगभग चीड़ की पत्तियों की शक्ल में काफी लम्बे व नुकीले होते हैं. इतने नुकीले की हाथ से पकड़ने में असावधानी बरती तो हाथ को भी लहुलूहान करते देर नही लगती. नुकीले होने के कारण मवेशी भी इसे खाना पसन्द नहीं करते. (Babil Grass Uttarakhand)
लेकिन पहाड़ के पहाड़ जैसे हौसले वाले लोगों ने सर्वथा अनुपयोगी ‘बुकिल’ को भी आग जलाने के लिए जहां उपयोगी साबित कर दिया, वहीं बाबिल को भी बहु-उपयोगी बनाने में अपने कौशल का प्रदर्शन कर दिखाया. बुकिल पहाड़ के जंगलों में बहुतायत से पाया जाने वाला पौधा है, जिसमें सफेद रंग के फूल आते हैं. न तो इसकी पत्तियों को जानवर खाते हैं और न इस के फूल लोगों को आकर्षित कर पाते हैं. लेकिन इस पौधे को कूटकर इसकी लुग्दी डांसी पत्थरों के परस्पर घर्षण से उत्पन्न चिंगारी को आग के रूप में सुलगाने में सहायक होती है. जब दियासलाई का आविष्कार नहीं हुआ था तो पहाड़ों में आग इसी तरह सुलगाई जाती थी.
पहाड़ के गांव के घरों के बाहर छत के बांसों (बल्लियों) में लटाकार झुकी हुई बाबिल के मूठों को सजाये आपने कभी अवश्य देखा होगा. बरसात के पानी से बचाने के लिए इसे छतों के नीचे रखा जाता है, ताकि वक्त-वेवक्त इसे काम में लाया जा सके. मवेशी भले ही इसकी घास को नहीं खाते, लेकिन रोजमर्रा की जिन्दगी में इसके एक नहीं अनेकों उपयोग हैं.
पहाड़ में मुख्य रूप से बाबिल या बाबड़ का उपयोग कूची बनाने के लिए किया जाता है. कूची बनाने के लिए बाबिल के एक मूठे को एक-दो घण्टे पानी में डुबो दिया जाता है, ताकि यह मुलायम हो जाय और हाथ से पकड़ने पर कटने की समस्या न हो. फिर इस घास की जड़ के हिस्सों को बराबर करके बीचों-बीच में 6 या 8 इंच का मोटा डण्डा फंसाकर बाबिल के साथ कसकर बांध दिया जाता है. डण्डा कूची के सपोर्ट के लिए बांधा जाता है, अन्यथा केवल बाबिल के मूठे को भी कसकर बांध सकते हैं. इसके बाद बांधे गये मूठे को नीचे की ओर करके चारों ओर बाबिल की ऊपरी छोर की घास को झुका दिया जाता है, इस प्रकार की आपके द्वारा बांधी गयी गांठ अन्दर की ओर चली जाय. अब बटी गयी बाबिल की डोरियों से नीचे से दो इंच छोड़कर बांधते जायें, डोरी इतनी लम्बी हो कि एक ही डोरी से हर दो इंच की दूरी पर बांधते चले जायें. इस प्रकार एक कूची में लम्बाई के अनुसार चार पांच गांठ तक कस कर दें. गांठें जितनी नजदीक होंगी, कूची उतनी ही टिकाऊ होगी. अन्तिम गांठ के बाद कूची में 3-4 इंच खुला छोड़कर घास के सिरों को बराबर में किसी धारदार वसूले अथवा दराती से नीचे लकड़ी का आधार लेकर काट दें. आपकी कूची तैयार हो गयी. पहाड़ के गांवों में घर की साफ-सफाई के लिए झाड़ू के रूप में तो इसका आम उपयोग होता ही है साथ ही घर की पोताई करने में भी इसका इस्तेमाल बखूबी किया जाता है.
बाबिल का दूसरा उपयोग इससे रस्सी बनाने में किया जाता है. इससे बनी रस्सी भीमल की रस्सी से ज्यादा मजबूत बतायी जाती है, बशर्ते कि पानी से उसका बचाव हो. इस रस्सी का उपयोग जंगल से घास, लकड़ी लाने के साथ ही चारपाई के निवाड़ के रूप में भी किया जाता है. पहाड़ के गांवों में शवयात्रा के समय शव को बांधने में भी कई लोग बाबिल की डोरियों का इस्तेमाल करते हैं. इस कारण कई लोग बाबिल की रस्सियों का ऐब भी मानते हैं.
टोने टोटके के रूप में बाबिल घास से झाड़ने के रूप में भी कुछ लोग प्रयोग करते हैं. पहाड़ में पहले घरों में दीवारों पर मिट्टी का ही प्लास्टर हुआ करता था, तब बाबिल को छोटे छोटे टुकड़ों को काटकर मिट्टी में मिलाया जाता था, जिससे मिट्टी चटकती नहीं थी.
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भवाली में रहने वाले भुवन चन्द्र पन्त ने वर्ष 2014 तक नैनीताल के भारतीय शहीद सैनिक विद्यालय में 34 वर्षों तक सेवा दी है. आकाशवाणी के विभिन्न केन्द्रों से उनकी कवितायें प्रसारित हो चुकी हैं.
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बाबिल घास के बार में रोचक जानकारी उपलब्ध करवाई आपने। आभार।