बटरोही

भीमताल की जर्मन बहू ने दुनिया को नयी ज़िंदगी दी

भीमताल की जून एस्टेट एक मिथक की तरह नैनीताल-वासियों के मन में हमेशा रही है. जब हम लोग नैनीताल के डीएसबी में पढ़ते थे, अमूमन आर्ट्स ब्लॉक के सामने हरे ब्लेज़र में दो फिरंगी से दिखने वाले लड़के पूरे कॉलेज के आकर्षण का केंद्र होते थे. बड़ा भाई विक्टर स्मेटेचैक और उसका छोटा भाई फ्रेडरिक. विक्टर बाद में अपनी अगली पढ़ाई के लिए जर्मनी चला गया और फ्रेडी ने अपने पैतृक आवास में तितलियों का जबरदस्त संग्रहालय स्थापित किया जिसे उसकी मृत्यु के बाद छोटे भाई टॉम ने सम्हाला.
(Batrohi Article December 2021)

जिन दिनों मैं बुदापैश्त में था, सुबह के करीब पांच बजे फोन पर आवाज़ सुनाई दी, ‘क्ये हाल है रई लक्ष्मण, यूरोप में मन लागि गो?’ भारत से हजारों मील दूर परदेस में अपनी बोली सुनकर कौन हैरत में नहीं पड़ेगा? मेरी चुप्पी को ताड़कर फिर आवाज आई, ‘किले नि पच्छांण, अरे मैं विक्टर बुलानयीं यार.’

मैं उसके फोन का इंतज़ार कर ही रहा था, मगर इतनी सवेरे कोई कुमाऊनी में मुझे उठाएगा, ऐसा सपने में भी नहीं सोचा था. विक्टर जर्मनी के दक्षिण में स्थित मशहूर शहर ब्रामेनहावेन में समुद्रविज्ञान का प्रोफ़ेसर था और कम उम्र में ही उसका ज़िक्र संसार के चोटी के सौ समुद्र-विज्ञानियों में किया जाने लगा था. डीएसबी की हमारी बिछड़ी दोस्ती उसके बाद फिर से जुड़ी और जल्दी ही उसने मुझे अपने घर निमंत्रित किया. मैं पंद्रह दिनों तक विक्टर और उसकी जर्मन पत्नी करेन के साथ उनकी विशाल कोठी में मेहमान रहा. करेन के साथ विक्टर के विवाह की भी एक लम्बी रोमांचक कहानी है, जैसा अमूमन खुद को शुद्ध रक्त मानने वाले जर्मनों में बड़प्पन की ग्रंथि होती है, और जिसके कारण उन्हें अपने ही धर्म के दूसरे लोगों को स्वीकार करने नहीं देती. करेन के पिता ने इसी ग्रंथि के कारण आखिरी वक़्त तक अपने दामाद को माफ़ नहीं किया और विक्टर ने बताया कि जब उसके ससुर आखिरी साँस ले रहे थे, माफ़ी मांगने के भाव से वह उनकी चारपाई के सिरहाने खड़ा था, तब भी उन्होंने अपना मुंह फेर लिया था.

मैं यहाँ पर एक दूसरी रोमांचक कहानी का ज़िक्र करना चाहता हूँ. विक्टर और करेन ब्रामेनहावेन यूनिवर्सिटी के एक छोटे-से फ्लैट में खुशहाल जिंदगी गुजार रहे थे. एक दिन जब वे दोनों अपनी कार से ड्राइव कर रहे थे, दूसरी ओर से तेज़ी से आ रही नए मॉडल की एक कार ने टक्कर मारी और करेन की गाड़ी को रौंदती हुई आगे बढ़ गई. कार करेन ही चला रही थी जिससे उसके शरीर का दाहिना हिस्सा पूरी तरह पिस गया.

थोड़ा आगे बढ़ने के बाद उस व्यक्ति ने अपनी कार रोकी और यह समझते उसे देर नहीं लगी कि दुर्घटना उसकी वजह से ही हुई है. एकाएक वह पश्चाताप की आग में जलने लगा. वह व्यक्ति जर्मनी का एक विख्यात उद्योगपति था और अपनी ब्रामेनहावेन एस्टेट में घूमने के लिए आया हुआ था. वह एक लम्बी कहानी है कि किस तरह उस जर्मन उद्योगपति और विक्टर ने रात-दिन एक कर करेन की सेवा की और लम्बे इलाज के बाद वह बच गई. उद्योगपति उसके बाद जबरदस्त सदमे में आ गया और उससे उबरने के लिए ही उसने ब्रामेनहावेन ने अपनी का एक हिस्सा करेन के नाम कर दिया. हालाँकि करेन के शरीर का दाहिना हिस्सा पूरी तरह ख़राब हो चुका था, मगर जिंदा रहने की जिजीविषा ने उसे नए सिरे से जीवन शुरू करने का हौसला दिया और उसने खुद ही एक कार डिजाईन की जिसमें बाएँ पाँव से ही ब्रेक-क्लच आदि को नियंत्रित करने की प्रणाली विकसित की और जब लम्बी मेहनत के बाद उस गाड़ी को करेन ने ब्रामेनहावेन एस्टेट में अपने बाएँ हाथ से चलाकर दौड़ाया तो सारा जर्मनी दंग रह गया. देखते-देखते पूरे देश में करेन की इस उपलब्धि की चर्चा होने लगी और करेन दुनिया भर के मीडिया में छा गई. रीडर्स डाइजेस्ट के जर्मन संस्करण ने करेन पर कवर-स्टोरी लिखी और संसार भर के लोगों से उसके इस अभूतपूर्व योगदान से सीख लेने की बात कही. अपनी इस उपलब्धि से उत्साहित होकर ही करेन ने शारीरिक रूप से कमजोर युवाओं के लिए एक संस्था आरम्भ की और उनमें नए सिरे से आत्म-विश्वास जगाया कि दुनिया में कोई भी काम असंभव नहीं है और ज़िंदगी की शुरुआत उम्र के किसी भी मोड़ से नए सिरे से की जा सकती है.
(Batrohi Article December 2021)

रीडर्स डायडेस्ट (जर्मन संस्करण) के अगस्त, 2000 अंक में प्रकाशित करेन पर कवर स्टोरी

करेन अनेकों बार भीमताल के अपने घर आ चुकी है और वहां भी वह युवाओं की चहेती रही है. नैनीताल के डीएसबी परिसर में जब मैंने कॉलेज के भूतपूर्व छात्र के रूप में विक्टर का युवा विद्यार्थियों से परिचय करवाया था, वह सचमुच भावुक हो गया था. करेन भी उस दिन उसका भाषण सुनने आई थी. वह हिंदी नहीं बोल पाती थी, मैंने आग्रह पूर्वक उससे हिंदी में कुछ बोलने का आग्रह किया था और उसने मेरे आग्रह को टाला नहीं था. पता नहीं, नैनीताल के युवाओं ने उससे क्या और कितना सीखा था. उसकी हिंदी नैनीताल के लड़के-लड़कियों के कितनी पल्ले पड़ी होगी?

करेन की ब्रामेनहावेन एस्टेट में पंद्रह दिनों तक का प्रवास मैं भला कैसे भूल सकता हूँ? विशाल स्वीमिंग पूल में हर सुबह नहाया, बंगले से लगे घने जंगल में तबीयत से सैर की और पक्षियों-झींगुरों का मादक संगीत सुना. करेन ने अपने घर के मुख्य द्वार पर गणेश की भव्य मूर्ति स्थापित की हुई है और विक्टर की स्टडी में भारतीय शास्त्रीय संगीत का अविस्मरणीय संग्रहालय है. वो कैसेट का ज़माना था, शायद ही कोई शास्त्रीय गायक होगा जो विक्टर और करेन की नज़रों से रह गया हो. ब्रामेनहावेन के समुद्री तट पर पांच-सितारा माहौल में खायी गई दावतों का वह स्वाद क्या कभी भुलाया जा सकता है?
(Batrohi Article December 2021)

लक्ष्मण सिह बिष्ट ‘बटरोही‘

फ़ोटो: मृगेश पाण्डे

 हिन्दी के जाने-माने उपन्यासकार-कहानीकार हैं. कुमाऊँ विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग के अध्यक्ष रह चुके बटरोही रामगढ़ स्थित महादेवी वर्मा सृजन पीठ के संस्थापक और भूतपूर्व निदेशक हैं. उनकी मुख्य कृतियों में ‘थोकदार किसी की नहीं सुनता’ ‘सड़क का भूगोल, ‘अनाथ मुहल्ले के ठुल दा’ और ‘महर ठाकुरों का गांव’ शामिल हैं. काफल ट्री के लिए नियमित लेखन. 

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  • दिलचस्प स्मृति वाला आख्यान, जिसमें जीवन भी है, हादसा भी और उमंग भी. फ्रेडरिक स्मेटचेक और उसके भीमताल वाले तितलियों के संग्रह पर उस समय उभरते अमर उजाला अखबार के पाक्षिक "दिशाभारती" में एक छोटा आलेख मेरा भी प्रकाशित हुआ था.
    • डॉ. भूपेंद्र बिष्ट

  • बहुत ही उत्‍तम संस्‍मरण। इतना प्रेरक, जीवन जीने का जज्‍बा। खास बात यह रही कि इसमें नैनीताल भीमताल, कुमाऊंनी बोलने वाले अंग्रेज। तितलियों संग्रह तो देखा है, लेकिन यह कहानी आज पहली बार पता चली, अब जब दुबारा जाऊंगा तो इसका अवश्‍य जिक्र करूंगा। बीच में विजय सती मैम ने कहा कि आप मेरे बारे में पूछ रहे थे तो मैं अभी इलाहाबाद में हूं। कई बार आपसे मिलना चाहा, इधर दो साल से कोरोना बाधा रहा। इन गर्मियों में अवश्‍य दर्शन करूंगा।
    शम्‍भूदत्‍त सती
    वर्धा

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