फोटो http://archive.boston.com से साभार
हमारी शिक्षा की गोभी सबसे पहले हमारी स्कूली शिक्षा से खुदती है. स्कूल में पढाई 80 प्रतिशत व्याहारिक बातें गलत होती हैं. हमें कक्षा तीन से दीपावली पर निबंध पर इंक पैन घिसना सिखाया गया अंग्रेजी में यह पैन घिसाई नवीं से शुरू होती थी. कक्षा के साथ शब्दों की संख्या बढ़ती गयी या यूं कहिये नये शब्द जुड़ते गये. निबंध वाली दीपावली और हमारे घरों की दीवाली में उतना ही अंतर होता था जितना फुसकी मुर्गा छाप और हरयाले रस्सी बम में होता है.
शुरुआत हमारे निबंध की पहली पंक्ति से ही की जाये. दीपावली दीपों का त्यौहार है. हमारे घर में दीपावली दीपों से ज्यादा मोमबत्ती का त्यौहार हुआ करता था. जिस मोमबत्ती के गले हुये टुकड़े अगले दिन घरवाले बच्चों से जमीन से खुरचा – खुरचा कर निकलवाते थे. जाड़ों में यही हमारे परिवार का वैसलीन हुआ करता था. होंठ से पैरों की एड़ी तक की हिफ़ाजत इसी के हवाले थी.
जमाना बदला हमारी दीपावली बिजली की माला वाली हो गयी. भले ही भारत में कानूनन आप अठारह साल बाद वयस्क होते हों लेकिन हमारे परिवारों में अगर आपको बिजली की माला लगाना आ गया तो आप पर वयस्कता का ठप्पा लग जाता था. यही काम अगर किसी मौहल्ले में किसी लड़की ने कर दिया तो लड़की को बिजली की माला लगाने के लिये भारत रत्न योग्य समझा जाता था.
इस बिजली माला प्रकरण का एक नुकसान यह था कि अगर आपको माला लगानी आ गयी तो आप इंजीनियरिंग की परीक्षा के लिये स्वतः काबिल हो जाते थे. बिजली की माला घर में चमकती थी और इंजीनियरिंग का बिल्ला आपका आभा मंडल तैयार कर देता था. लेकिन हमारे निबंध की पहली लाइन अब भी वही थी दीपावली दीपों का त्यौहार है.
दीपावली के दीपों जैसी तमाम किताबी गप्पों के बीच एक गप्प लिखी जाती थी कि दीपावली में बच्चों को खूब मिठाईयां मिलती हैं. यह पंक्ति सच है लेकिन अधूरा सच है. दीपावली में बच्चों की कुटाई सबसे ज्यादा मिठाई के कारण होती है. भारतीय इतिहास में ऐसे बच्चे गिनती के मिल जायेंगे जिसने मिठाई के चक्कर में दीपावली में मार ना खायी हो. ऐसे बच्चों की संख्या ज्यादा मिलने की संभावना भी है जिन्होंने दीपावली की मिठाई की वजह से मिठाई से ज्यादा कुटाई ज्यादा खाई हो.
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