फोटो: सुधीर कुमार
‘प्रधानी का चुनाव लड़ा जाए?’ एक सुबह बिल्कुल अचानक पुष्कर ने पूछा.
‘बहुत अच्छा रहेगा,’ कविता खुश हुई.
‘सही में?’
‘बिल्कुल! जानते हो, कई बार सोचती हूं कि गांव में रहने तो हम आ गए लेकिन कर क्या रहे हैं. मेरी पत्रकारिता छूट गई. चलो, उसमें कोई बड़े तीर नहीं मार रही थी लेकिन किताब के लिए दौरे और इण्टरव्यू भी बंद हो गए. और, तुमने बिल्कुल ही हाथ-पैर छोड़ दिए. लिखना बंद किया और वाहिनी से पीठ ही फेर ली.’
‘वाहिनी ने बहुत निराश किया.’
‘प्रधानी से गांव स्तर पर काफी काम किए जा सकते हैं. वाहिनी को बहुत पहले पंचायतों के चुनाव लड़ने चाहिए थे. कुछ काम होता, जमीन तैयार होती और जनता का भरोसा बनता.’
कविता ने पुष्कर के मन की बात कह दी थी. वह उत्साहित हो गया. कमलेश दाज्यू, रामदत्त ताऊ जी और श्याम बड़बाज्यू से बात की. तीनों ने हौसला बढ़ाया. बड़े जोश में पहले ही दिन उसका नामांकन भर दिया गया. सुमकोट ग्राम सभा में पांच गांव शामिल थे. सुमकोट के अलावा शिलगाम, ठुलगांव, जमतोला और भरूं. शिलगाम शिल्पकारों का गांव था, जहां का नरराम पिछली बार प्रधान चुना गया था. तब सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित थी. इस बार सामान्य हो गई थी. ठुलगांव में ठाकुरों की बड़ी आबादी थी, जमतोला और भरूं ब्राह्मण-बहुल छोटे गांव थे. मिल-बैठकर प्रचार की रणनीति बनाई जाने लगी.
तभी माधव आ गया. इधर उसका आना-जाना बढ़ गया था. अगले ही दिन बिना किसी से सलाह किए उसने ग्राम प्रधानी का चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी. बड़े जोर से वादा भी किया कि सिमल्ता से सुमकोट तक सड़क बनेगी. पुष्कर अचानक हुई इस घोषणा पर विचार करने बैठा ही था कि माधव शिलगाम में ग्राम प्रधान नरराम के आंगन में जा पहुंचा- ‘पधान ज्यू, पिछली बार सुमकोट के बामणों ने तुम्हारा समर्थन किया था. इस बार मुझे शिल्पकारों का समर्थन चाहिए. चक्रानुक्रम में सीट फिर आरक्षित होगी ही.’
पिछली बार जब अवैध खड़िया खदान के कारण रौतेली गांव के ठाकुर लाठी-डण्डा लेकर सुमकोट के तिवाड़ियों पर चढ़ बैठे थे तो नरराम ने विधायक बहादुर राम से कहकर बामणों की मदद की थी. जिन ठाकुरों के खेत भू-स्खलन में दब गए थे उन्हें डीएम से मुआवजा दिलवा कर मामला सुलटा दिया था. बदले में सुमकोट वालों के वोट पाए थे.
‘आपके बिरादर पुष्कर ज्यू तो नामांकन भी भर आए,’ नरराम ने बताया. माधव को बड़ा अचम्भा हुआ. वह यह सोच भी नहीं सकता था. पुष्कर दाज्यू इसीलिए गांव आए क्या! घड़ी भर को वह चुप रह गया, फिर बोला- ‘नहीं-नहीं मैं लड़ूंगा. उनसे बात हो जाएगी.’
पांच साल की प्रधानी और विधायक बहादुर राम की संगत ने नरराम को राजनीति-कुशल और व्यावहारिक बना दिया था. उसने हंसकर कहा- ‘ठीक है पंड्डिज्यू, आप लोगों का समर्थन तो करना ही हुआ. विधायक जी आएंगे तो बात कर लूंगा.’
‘उनसे देहरादून में बात हो गई,’ माधव की गर्वोक्ति ने नरराम को समझा दिया कि बामणों का लड़का जितना ऊपर दिख रहा उतना ही नीचे भी है. देहरादून का असर बड़ी जल्दी पड़ा! उसने हाथ जोड़ दिए- ‘जो हुकुम, फिर.’
माधव गलत नहीं कह रहा था. उसे ग्राम प्रधानी का चुनाव लड़ाने का विचार कुंदन शाह का था. उसी ने बहादुरराम से बात की थी. सुमकोट से लौटकर गुंजन ने जो बताया था, उससे कुंदन ने माधव की व्यावसायिक बुद्धि की दाद दी थी. सुमकोट में जमीन का एक छोटा टुकड़ा उनके कब्जे में आ चुका था. उससे लगी और जमीन चाहिए होगी. यदि माधव को ग्राम प्रधान बनवा दिया जाए तो बाकी जमीन खरीदना आसान हो जाएगा. इसमें ग्राम प्रधानों की भूमिका महत्त्वपूर्ण थी. यह बात वह लखनऊ में जमीन खरीदने-बेचने का धंधा शुरू करने के दौरान ही समझ गया था. यह भी जानता ही था कि पंचायत चुनाव के दांव-पेंच क्षेत्र का विधायक ही चलता है. तभी कुंदन बहादुर राम से मिला. वह पिछली विधान सभा में भाजपा का सदस्य था. इस बार पार्टी बदलकर कांग्रेस से लड़ा और जीता. गिरीश रावत ने उसे टिकट देने में अड़ंगा लगाया तो वह तिवारी खेमे में चला गया था. अब तिवारी जी ने उसे अनुसूचित जाति-जनजाति कल्याण निगम का अध्यक्ष बनाकर लाल बत्ती की हैसियत दे दी थी. मुख्यमंत्री के निकट पहुंचने की कोशिश में कुंदन शाह का बहादुर राम से रिश्ता पहले ही बन चुका था. सो, बात बन गई. इतनी तैयारी के बाद माधव गांव आया था.
रामदत्त और श्यामदत्त जी ने माधव को समझाया- ‘ऐसा है बेटा माधव, पुष्कर हर प्रकार से योग्य है. उसे ही लड़ने दो. तुम्हारी अभी उमर ही क्या है.’
‘नहीं बड़बाज्यू, मेरा तो पहले से तय था. सारी तैयारी करके आया हूं. मैं ही लड़ूंगा,’ उसका दो टूक जवाब सुनकर दोनों निरुपाय पुष्कर के पास लौट आए. पुष्कर असमंजस में पड़ गया.
‘पुष्कर, तुम लड़ो. उसे भी लड़ने दो,’ कविता ने निर्णयात्मक स्वर में कहा.
‘बिरादरी में मनमुटाव न हो,’ रामदत्त जी ने धीरे से कहा. श्याम बड़बाज्यू ने चुपचाप गर्दन हिला दी.
ठुलगांव का जोगा सिंह भी मैदान में कूद गया. उसकी उम्मीदवारी के पीछे विधान सभा चुनाव में कांग्रेस-टिकट-वंचित प्रेमराम की राजनीति थी. उसका टिकट काटकर दलबदलू बहादुर राम को दिए जाने का कांटा उसकी छाती में गहरे गड़ा था. उसे पार्टी को दिखाना था कि बहादुर राम भाजपा विरोधी लहर में विधायक तो बन गया लेकिन एक ग्राम प्रधान भी जितवा नहीं सकता. पुष्कर, कविता और सुमकोट के दो-चार लोग रोज एक गांव में पूरा दिन बिताते. ग्राम पंचायत क्या-क्या कर सकती है, क्या और कैसी योजनाएं हैं, कितना धन आता है और कैसे उसकी लूट होती है, यह समझाते. पलायन के दौर में शहर से आकर गांव में रहने से उसके प्रति सराहना का भाव पहले से था. कुछ लोगों को उसकी आंदोलनकारी भूमिका के बारे में भी पता था. ब्लॉक दफ्तर तक दौड़ लगाकर उसने सुमकोट में शौचालय और खड़ंजा बनवाए थे. गोकुल अपनी दुकान बंद कर दिन भर उनके साथ लगा रहता. ग्रामीणों को स्मरण हो आता कि दीपा को मरणासन्न हालत में अल्मोड़ा ले जाकर किसने उसकी जान बचाई. समर्थन और प्यार देखकर कविता को लगता कि पुष्कर जीत जाएगा.
जोगा सिंह के पीछे प्रेमराम ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी. जोगा सिंह खुद भी पैसे से मजबूत था. सेना से रिटायर हुआ था. बेटा और छोटा भाई भी फौज में हैं. गांवों में बकरे और फौजी रम की दावतें उड़ने लगीं. प्रेम राम ने विलायती पव्वे बंटवा कर शिल्पकारों में फूट डाल दी. आधे से अधिक शिलगाम जोगा सिंह के समर्थन में दिखने लगा. माधव पूरी तरह कुंदन शाह के भरोसे था. गुंजन सिमल्ता में रुककर उसका चुनाव देख रहा था. देहरादून से चार-पांच लोग उसके फोटो वाले पर्चे बांटने आ गए. कुंदन ने माधव की जीत को अपनी प्रतिष्ठा का मुद्दा बना रखा था. कमलेश से बड़ी चिंता जोगा सिंह बन गया. शिल्पकारों और बामणों के वोटों का बंटना अच्छा संकेत नहीं था. ‘शाह-चड्ढा ग्रुप ऑफ नेचर कॉटेजेज’ के पहले प्रोजेक्ट को हर हाल में सफल बनाना था. इसके लिए माधव का जीतना जरूरी था.
कुंदन शाह को स्वयं सिमल्ता तक आना पड़ा. सड़क किनारे खड़ी जिस ‘गजब गाड़ी’ को पूरा बाजार उत्सुकता से देख रहा था, उसके काले शीशों के भीतर बैठकर कुंदन शाह की प्रेमराम और जोगा सिंह से थोड़ी देर बात हुई. प्रेमराम उसी गाड़ी में देहरादून चला गया. जोगा सिंह ने घोषणा कर दी कि वह माधव तिवाड़ी के समर्थन में मैदान से हट गया है. अगले दो दिन माधव और जोगा सिंह को साथ लेकर देहरादून से आए दो लोग घर-घर गए.
‘अब समझी तुम कि सी पी को अल्मोड़ा विधान सभा में सिर्फ पंद्रह सौ वोट क्यों मिले?’ अपना चुनाव नतीजा सुनकर पुष्कर ने कविता के चेहरे पर आंखें गड़ा दीं.
‘जोगा सिंह क्यों बैठा? घर-घर नोट बांटे गए, श्याम बड़बाज्यू ने खुद बताया,’ कविता तमतमाई हुई थी.
‘नोट बांटे, शराब बांटी, अटैची देकर किसी को बैठा दिया… किसी को गोली मार दी…. पंचायत चुनावों का यह हाल उत्तराखण्ड का भविष्य बता रहा है,’ पुष्कर आवेश में बोला- ‘नोट कर लो, लोक वाहिनी हो या वाम दल, कभी चुनाव नहीं जीतेंगे. यू पी ही की तरह धनबली, बाहुबली, माफिया, ठेकेदार, दलाल यहां भी राज करेंगे. सुमकोट की प्रधानी का चुनाव माधव नहीं, यही ताकतें जीती हैं. हम बेवकूफ निकले जो माधव को अकेला और महत्वाकांक्षी समझ रहे थे.’
‘खाली इस लफड़े में पड़े,’ काकी चाय बना लाई थीं. वे सबसे ज़्यादा दुखी थीं.
‘इतनी क्रूर भविष्यवाणी मत करो पुष्कर!’ कविता ने चाय लेते हुए आपत्ति की.
‘भविष्यवाणी नहीं, जो साफ दिख रहा वही कह रहा हूं.’
‘ऐसा ही नहीं होता रहे, इसीलिए लोग लड़ रहे हैं. आंदोलन होते हैं कि स्थितियां बदलें.’
‘चिपको के समय से मैं देख रहा हूं. तुम पिछले आंदोलनों का अध्ययन कर रही हो. कुछ बदला? हम गलतफहमी पाले रहे कि राज्य जनता के आंदोलन से बना. जनता ने किसे जिताया? यह राज्य नेताओं ने अपने लिए ही बनाया है.’
‘हां, स्थितियां नहीं बदलीं. नेताओं या संगठनों से गलतियां भी हो जाती हैं. तुम्हारी समस्या यह है कि या तो अत्यधिक उत्साहित और आशावादी हो जाते हो या एकदम निराश. बदलाव बहुत लम्बी प्रक्रिया है और धैर्य मांगती है.’ बहुत ज़ल्दी हताश हो जाने के पुष्कर के स्वभाव पर कभी-कभी कविता को बड़ा गुस्सा आता था. वह उससे लड़ना चाहती लेकिन ज़ज़्ब कर जाती.
‘यानी लड़ते रहो और पिटते रहो.’
‘मुझे ये आंदोलन निरर्थक नहीं लगते, जैसा अब तुम मानने लगे हो. बल्कि, तुम्हारी हार से मेरा मन पक्का होने लगा है कि जनता को सचेत बनाने का अभियान और सघन होना चाहिए. आंदोलनों को राजनैतिक भी होना पड़ेगा,’ कविता के स्वर में दृढ़ता थी.
‘यही कहकर कुछ लोगों ने वाहिनी का विभाजन कराया लेकिन किया क्या उन्होंने? सलीम भी वर्षों से यही बात कहता है. सब बेकार.’
‘नहीं, आन्दोलन बेकार नहीं जाते. मैंने तो यही पाया कि मनचाहे नतीजे नहीं निकले लेकिन जन आंदोलन अपना असर छोड़ गए. चिपको आंदोलन एकाएक नहीं जन्मा. वह पुराने वन आंदोलनों से उपजी चेतना का परिणाम था. 1978 में गिर्दा के गीत ‘आज हिमाल तुमन कें धत्यूछौ…’ की जड़ें सत्तावन-अट्ठावन साल पहले गौर्दा के गीत ‘वृक्षन को विलाप’ में हैं. ‘नशा नहीं रोजगार दो’ आंदोलन के पीछे दशकों के नशा विरोधी अभियानों की प्रेरणा और चेतना थी. आंदोलन बिला जाते हैं लेकिन उनकी गूंज जनता के मानस में पलती-बढ़ती रहती है. समय और स्थितियों के ताप से फिर-फिर वह धारा फूटती है.‘
पुष्कर कुछ नहीं बोला. चुपचाप कविता को देखता रहा. सामने के चंद बालों में पहली बार सफेदी दिखाई दी. चेहरे पर प्रौढ़ होने की छाप थी. आंखें बता रही थीं कि उसने जो कहा वह बड़े विश्वास से कहा. पुष्कर को गौर से अपनी तरफ देखता पाकर वह फिर बोली-
‘एक बात बताऊं? मैंने ही गांव आकर रहने की जिद की थी. अब पाती हूं कि गांव में रहना अच्छा तो है लेकिन गांव में चुपचाप बैठे रहना बिल्कुल अच्छा नहीं.’ कविता खाली गिलास उठाकर भीतर चली गई. उसके कदमों की ध्वनि निर्णयात्मक थी.
पुष्कर सवालिया निगाहों से उसे देखता रहा.
श्याम बड़बाज्यू और हंसा आमा गांव छोड़कर जा रहे थे!
जब भी किसी मकान पर ताला लटकता, कई दिन पहले से हवा भारी हो जाती थी. चारों तरफ वीरानी-सी पसर जाती थी. पेड़-पौधे, गोठ के जानवर, आस-पास फुदकने-चहचहाने वाली चिड़ियां, गाड़-गधेरों में बहता पानी, डांडे-कांठे और उन पर उतरने-चढ़ने वाली धूप-छाया, सब बेरंग हो जाते. ग्रामीणों की आवाज में उच्छवास फूटता.
श्याम बड़बाज्यू का जाना अधिक ही भारी पड़ रहा था. वे गांव के सबसे बुजुर्ग थे. सबसे अनुभवी. बर्मा तक देखा ठहरा उनका, जब दूसरे विश्व युद्ध में अंग्रेजी फौज के साथ लड़ने गए थे. उस परिवार का होना गांव में एक छतनार वृक्ष का होना था. सब उनकी बात मानते थे. भाइयों में बंटवारा होता तो वे ही खेतों, बर्तनों और पशुओं को बांट देते. कोई झगड़ा हो या जात-बिरादरी का मुद्दा, सब उनकी बात मानते थे. पंच-परमेश्वर की तरह थे वे. गांव के मंदिर, नौलिंड. ज्यू के पुजारी भी वे ही हुए. गांव के ‘धनिक’ भी वे ही थे. पेंशन मिलती थी और दोनों बेटे नौकरी वाले थे. खेती उन्हीं के पास ज़्यादा थी. गांव के अत्यंत गरीब परिवार उन्हीं के यहां काम और दाम पाते. अटक-बिटक नकद, उधार और ‘पेंचा’ (सामान के बदले सामान) भी.
अब वे जा रहे थे. बल्कि, ले जाए जा रहे थे. उनका बड़ा लड़का भगवत हफ्ता भर पहले आ गया था. वह भोपाल में एक डिग्री कॉलेज में मास्टर है. साल में एक बार, आम तौर पर गर्मी में कॉलेज की छुट्टी होने पर, इजा-बाबू को देखने आ जाता था. पहले बीवी-बच्चों को भी साथ लाता था. महीने भर घर-गांव गुलजार हो जाता. फिर बच्चे बड़े हो गए. उन्होंने आना छोड़ दिया. गांव में ‘बोर’ होते थे. श्याम बड़बाज्यू और हंसा आमा समझ नहीं पाते थे कि ‘बोर होना’ क्या होता है. धीरे-धीरे बच्चों के साथ उनकी ‘मम्मी’ ने भी आना छोड़ दिया था. छोटा बेटा केशव मुम्बई बस गया था. वह बहुत मतलब नहीं रखता था. भूले भटके कभी चिट्ठी डाल देता या मनी-ऑर्डर कर देता. भगवत मोहिला था, हर साल आता. कई बरस से उसकी एक ही रट थी कि बाबू, मेरे साथ चलो. अब उमर हो गई है और मैं समय-असमय दौड़ा नहीं आ सकता. हर चिट्ठी में भी यही दोहराता. श्याम दत्त जी कतई जाना नहीं चाहते थे. हंसा आमा तो जाने की बात सुनते ही रोना-धोना शुरू कर देती- ‘आखिरी बखत पुरखों की देहरी छोड़कर कहां जाना, क्यों जाना.’ इसी डर से कभी तबीयत खराब होने पर भी बेटों को बताते नहीं थे. पिछले महीने हंसा आमा बहुत बीमार पड़ीं. बुखार सिर में ऐसा चढ़ा कि बेहोश हो गईं. बचने की आस न रही. पुष्कर गणाई जाकर दवा लाया और वहीं से भगवत को फोन कर आया. भगवत ने इस बार कोई बहाना नहीं सुना.
पूरा गांव, कुल पंद्रह मवास (परिवार) ही तो बचे थे, उनके चाख में जमा था. कल सुबह-सुबह रवानगी थी. इसलिए शाम को सब भेंट करने आए थे. महिलाएं आंचल से बार-बार आंखें पोछ रही थीं. वे हंसा आमा को घेर कर बैठी थीं, जिनके आंसू थम नहीं रहे थे.
‘सोचती थी, यहीं डोली आई, यहीं से मिट्टी उठेगी,’ उनकी रुलाई फिर फूटी.
भगवत भीतर के कमरे में सामान बांधने में लगा था. उसने माहौल हलका करने के लिए कहा- ‘इजा, वहां बहुत बढ़िया श्मशान घाट है. क्यों रो-रो कर आंखें फोड़ रही हो.’ किसी के होठों पर हंसी की रेख तक न दिखी. माहौल बहुत भारी था.
‘जो ऊपर वाले ने लिख दिया ठहरा,’ श्याम बड़बाज्यू ने धीरे से कहा. वे अपने को सम्भाल चुके थे यद्यपि आवाज में भीतर की टूटन साफ थी जिसे छुपाने के लिए उन्होंने हुक्का जोर से गुड़गुड़ा दिया. अचानक वे उठे और चाख की अलमारी से अखबार में लिपटा छोटा-सा बण्डल निकालकर रामदत्त के हाथ में थमा दिया- ‘ये तू रख ले, रामदत्त. अब वहां इसका क्या काम!’ उसमें खुशबूदार तम्बाकू की आधी पिण्डी थी.
‘कका ज्यू!’ रामदत्त इससे अधिक बोल न पाए.
श्याम बड़बाज्यू पर गांव की कई जिम्मेदारियां थीं. तीन-चार दिन से वे लोगों को समझाने और सामान सौंपने में लगे थे. सबसे पहले नौलिंड. देवता की पूजा और मंदिर का सामान सौंपा गया. भुंकर (भ्वांकरा) और चंवर, शंख-घण्ट, बड़ी आरती, पंच-पात्र, अर्घ, वगैरह, जो उनके पास रहते थे, अपने भतीजे रामदत्त के हवाले किए और हिदायत दी कि ‘सुतक-नातक’ (मृत्यु एवं जन्म के समय की छूत) छोड़कर दिया जलाना कभी न छूटे. उनके बाद रामदत्त ही सयाने रह जाएंगे गांव में. वैसे रामदत्त को सब पता था. पूजा-पाठ में साथ बैठते ही थे. रोजमर्रा के पकाने-खाने वाले पीतल, तांबे और कांसे के बर्तन जरूरत के हिसाब से अलग-अलग परिवारों को दे दिए. अनाज मांड़ने-सुखाने वाला ‘मोस्टा’ (बड़ी चटाई) कैलाश को दिया. उसका मोस्टा कई बरस पहले टूट-बिखर गया था और वह नया खरीद नहीं सका था. ऐसी चीजें नए जमाने में दुर्लभ हो चली थीं. छोटा खूबसूरत ‘दन’ (कालीन) तो भगवत अपने साथ ले जा रहा था लेकिन कुछ पुराने और बड़े दन-चुकुट अपने प्रिय परिवारों को दे दिए. सामूहिक भोज में इस्तेमाल होने वाले दस और बारह नाली (माप) के विशाल ‘कुन’ (पतीले) तथा भद्याले (विशाल कढ़ाहियां) सम्भालने के लिए अलग-अलग परिवारों को सौंपे.
‘इनमें कौन पका रहा अब? छह नाली भात में पूरे गांव का पेट भर जाता है. बचा ही कौन खाने वाला!’ कमलेश ने उदासी से कहा. सच यही था. कितने वर्ष से इन विशाल बर्तनों में पकाने की आवश्यकता नहीं पड़ी थी.
बैल, गाय और भैंस लेने के लिए शिलगाम के कुछ शिल्पकार पहले से चक्कर लगा रहे थे. उन्हें वे बकायदा कुछ दाम देकर ले गए. अपने पाले-सैंते प्यारे पशुओं से बिछडना बहुत हृदय विदारक रहा. ‘काई’ भैंस उनके गोठ में कई पीढ़ियों से पली आ रही इसी नाम की भैंस की संतति थी और हंसा आमा की बहुत दुलारी भी. वह आंगन से जाती ही न थी. तब रोती-बिलखती हंसा आमा बेतरह रम्भाती ‘काई’ को गांव की सीमा तक खुद विदा कर आईं. श्याम दत्त जी के लिए सबसे पीड़ादायक अपने बैल से बिछड़ना रहा. उनसे अपने कान खुजलाए बिना वह गोठ में बंधता न था. गाय पिछले ही बरस खरीदी गई थी तो भी वह रुलाकर गई. पुश्त-दर-पुश्त चले आए ‘नाली, ‘माणा’, ‘नय्यी’, ‘हड़पी’, ‘ठेकियां’ ‘पाई’ (दूध-दही-छांछ रखने के लकड़ी के बर्तन) उन्हें बांटे गए जिनके यहां ‘धिनाली’ (दुधारू पशु) ठीक-ठाक रहती है. अधिक दिन तक दूध-दही नहीं रखे जाने पर ये बर्तन चिटक कर फूट जाते थे. लकड़ी के इन दुर्लभ बर्तनों की जगह अब अल्यूमीनियम और स्टील के भाण्डे ले रहे थे.
सुबह ज़ल्दी निकलना था. भगवत ने तिलुवा लाटे, दामोदर और कमलेश की पीठ पर सामान लादकर आगे भिजवा दिया था. गांव की सबसे बुजुर्ग महिला को ढोक देने (पांय लागन) में महिलाओं ने बहुत देर लगा दी. एक-एक कर वे उनके गले लगतीं और रोतीं. भगवत इस ‘नाटक’ से चिढ़ रहा था और बार-बार ‘ज़ल्दी करो-ज़ल्दी करो’ की रट लगाए था. हंसा आमा ने अपने आंचल में रखे अक्षत घर की देहरी पर छिड़के. यूं, यह ब्याहता लड़कियों के मायके से ससुराल जाते समय निभाने की रीत थी- एक कामना कि यह देहरी राजी-खुशी रहे और मेरा यहां बार-बार लौटना हो. हंसा आमा साठ वर्ष पहले इस देहरी की पूजा कर इसमें सदा के लिए प्रविष्ट हुई थीं. उन्हें कहीं जाना नहीं था या जाकर भी यहीं लौट आना था. आज उन्होंने मायके से विदा होती लड़की की तरह देहरी पूजी, हालांकि वे जानती थीं कि अब यहां लौटना होना नहीं है.
श्याम दत्त जी ने किसी को रोने-धोने का मौका न दिया. वे तैयार होकर सीधे नौलिंड. ज्यू के मंदिर गए, मत्था टेका, रोली-अक्षत लगाया, एक सिक्का देवता के चरणों में चढ़ाया और उलटे पांव मंदिर परिसर से निकले. घर के दरवाजे पर आकर उन्होंने सांकल चढ़ाई, ताला लगाते हुए हाथ ठिठका लेकिन फिर चाबी जेब में रखकर लाठी टेकते हुए यथासम्भव तेज कदमों से गांव से बाहर जाने वाली पगडण्डी पर बढ़ लिए. मोड़ से उनके ओझल होते ही पूरे गांव पर छाई उदासी की परत घनी हो गई थी.
श्याम बड़बाज्यू के दरवाजे पर लगा ताला जैसे पूरे गांव पर लटक गया था.
गैरसैण से कर्णप्रयाग की ओर बढ़ने पर आदि बदरी क्षेत्र में एक पहाड़ की चोटी इस तरह पसरी हुई है जैसे किसी बच्चे को पीठ पर बैठाने के लिए झुक गई हो. जंगल ने भी छंटकर हलकी ढाल वाली पीठ पर घास को फैलने का मौका दे दिया है. इस पीठ पर खड़े हो जाइए तो दूर-दूर तक पहाड़ों और बर्फीली चोटियों का सुंदर दृश्य बांध लेता है. उस दृश्य से फुर्सत पाकर पलकें झुकाएंगे तो ढलान पर एक छोटी झील भीड़-भाड़ से बचती-दुबकी हुई दिखेगी- बेनीताल. इसी झील के नाम पर यह इलाका और आस-पास फैला गांव बेनीताल कहाता है.
बेनीताल के टोपरी उड्यार के एक मकान में बाबा मोहन उत्तराखण्डी गैरसैण को राजधानी बनाने की मांग के लिए दो जुलाई 2004 से आमरण अनशन पर हैं. आज आठ अगस्त है. बिना अन्न-जल ग्रहण किए बाबा को अढ़तीस दिन हो गए हैं. वे कम्बल ओढ़े आंख बंद किए शांत पड़े हैं. दिन की पाली के उनके साथी थोड़ी देर पहले ही गए हैं. रात की पाली के साथी अभी पहुंचे नहीं हैं. सिर्फ तीन किशोरवय लड़के उनके पास बैठे धीमे स्वर में बात कर रहे हैं.
शाम के करीब छह बजे मकान के उड़के द्वार पर जोर की लात पड़ी. तीनों किशोर उछलकर खड़े हो गए. विस्फारित नेत्रों से लड़कों ने सिपाहियों समेत कई लोगों को कमरे में घुसते देखा. बाबा ने शोर सुनकर धीरे से पलकें खोलीं. तब तक कुछ लोगों ने उन्हें हाथों से खींचकर बैठा दिया. बाबा अशक्त देह से प्रतिरोध का प्रयास करने लगे. तीनों लड़के बाबा को बचाने के लिए बढ़े. कुछ हाथों ने उन्हें खींचकर लात-घूंसों से धुन दिया. उनकी भागती पीठ पर डण्डे पड़े.
जब तक तीनों रोते-चिल्लाते लड़कों से खबर पाकर ग्रामीण दौड़े आते, प्रशासन की टीम ने बाबा मोहन उत्तराखण्डी को कम्बल समेत उठाकर एक जीप में ठूंस दिया और कर्णप्रयाग की तरफ सरपट भागे. दूसरी जीप में बैठ रहे एसडीएम और डॉक्टर को ग्रामीणों ने घेर लिया.
‘बाबा की प्राण रक्षा के लिए उन्हें अस्पताल भेजा गया है,’ एसडीएम ने बताया.
‘बाबा तो ठीक थे. उनका स्वास्थ्य परीक्षण हुआ?’
‘ये डॉक्टर साहब हैं,’ एसडीएम ने साथ के आदमी की ओर इशारा किया.
‘अगर उनकी जान को खतरा है तो डॉक्टर यहां क्या कर रहे हैं? साथ में क्यों नहीं गए?’
‘बाबा अपने पास जहर रखते हैं. जबरन उठाने पर खा भी सकते हैं,’ ग्रामीण चिंतित हो गए.
‘इसीलिए हमें तुरंत जाने दीजिए,’ दोनों जीप में बैठकर चले गए. राजधानी निर्माण संघर्ष समिति, बेनीताल के अध्यक्ष वीरेन्द्र मिंगवाल और बाबा के पुराने साथी पदम सिंह भी तब तक पहुंच गए. वे प्रशासन की इस छापामार शैली से आशंकित हुए. इतने दिन से प्रशासन ने खबर तक नहीं ली थी. समिति ने गैरसैण, सिमली और कर्णप्रयाग तक जाकर बाबा के समर्थन में प्रदर्शन किए थे. उनकी सेहत की जांच करने भी कोई नहीं आया. आज अचानक उन्हें ऐसे समय उठा लिया जब जिम्मेदार लोग मौजूद नहीं थे. उन्होंने कर्णप्रयाग के आंदोलनकारी साथियों से सम्पर्क करना शुरू किया.
कर्णप्रयाग में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के बाहर भीड़ जमा होने लगी. बेनीताल से खबर मिली थी कि बाबा मोहन उत्तराखण्डी को छह बजे उठाकर ले गए हैं. यहां आने में डेढ़ घण्टे से ज्यादा क्या लगेगा. सड़क पर आती गाड़ी की हेडलाइट दिखते ही लोगों में उत्तेजना बढ़ जाती. गाड़ी आगे निकल जाती तो वे बेचैन हो जाते. रात गहराने लगी. जीप का पता न बाबा का. भीड़ में बेचैनी बढ़ती जा रही थी. पुलिस तैनात कर दी गई. रात के दस बज गए लेकिन कोई जीप या दूसरी गाड़ी स्वास्थ्य केद्र पर नहीं रुकी.
‘क्या पता, द्वाराहाट या रानीखेत ले गए हों.’
‘सही कहा, वर्ना अब तक तो आ जाते. चार घण्टे हो रहे.’ इस सम्भावना के साथ मोहन उत्तराखण्डी की कुशल की कामना करते हुए लोग लौट गए.
‘बाबा मोहन उत्तराखण्डी की मौत हो गई है,’ सुबह कर्णप्रयाग में हल्ला मच गया. जिसने भी सुना स्वास्थ्य केंद्र की तरफ दौड़ा. अस्पताल के पलंग पर लाल कम्बल में लिपटा कोई पड़ा है. कौन है? ज़िंदा है या…? बाबा ही हैं? ठीक से देख लो. लाल कम्बल के कोने से खिचड़ी दाढ़ी और गोल टोपी झांक रही है.
गैरसैण को राजधानी बनाने के लिए बाबा मोहन उत्तराखण्डी शहीद हो गए!
‘शहीद बाबा उत्तराखण्डी ज़िंदाबाद, ज़िंदाबाद-ज़िंदाबाद!’
कितनी शहादत लेगी सरकार? मुख्यमंत्री को क्या हो गया है, क्यों नहीं घोषित कर देते गैरसैण को राजधानी? बाबा की जान ले ली, अब क्या लोगे? लाल बत्ती बांटने में लगे हो. जनता का धन फालतू उड़ा रहे हो और गैरसैण को राजधानी बनाने के लिए उस आयोग को ज़िंदा कर रहे हो जिसे भाजपा सरकार दफना गई थी! क्या करेगा कोई आयोग? जनता के आयोग ने कबके घोषित कर दी थी अपनी राजधानी. तुम कौन होते हो आयोग के फंदे से राजधानी को लटकाने वाले?
अरे, ये वही तिवारी है, जिसने कहा था ‘उत्तराखण्ड मेरी लाश पर बनेगा.’ क्यों बने बैठे हो अब इसके मुख्यमंत्री. जाओ, यहां से लखनऊ जाओ, दिल्ली जाओ. तुम्हारी जरूरत नहीं पहाड़ को.
‘शहीद बाबा उत्तराखण्डी ज़िंदाबाद, ज़िंदाबाद-ज़िंदाबाद!’
यहीं बुलाओ उस बूढ़े, नाकारा मुख्यमंत्री को. बाबा की लाश पर घोषित करे गैरसैण को राजधानी. हां-हां, बुलाओ. लाश नहीं उठने देंगे जब तक मुख्यमंत्री नहीं आते. कर्णप्रयाग के छोटे-से अस्पताल के बाहर उग्र भीड़ का घेरा बढ़ गया. लाश उठाकर गाड़ी में रखने के लिए खड़े पुलिस वाले चुपचाप बाहर खिसक गए. कांग्रेस सरकार के विरुद्ध नारे लगने लगे.
‘मुख्यमंत्री जब तक नहीं आएंगे, बाबा तब तक यहीं रहेंगे!’
पूरे कर्णप्रयाग की पुलिस जमा हो गई लेकिन भीड़ का आक्रोश देखकर एक किनारे मौन खड़ी रही. एसडीएम पुलिस की आड़ में दुबक गया. गोपेश्वर और देहरादून फोन घनघनाने लगे. दोपहर बाद डीएम पहुंचे और पुलिस के घेरे में आंदोलनकारियों के करीब आए.
‘सरकार को अनशनकारी बाबा की मौत का बहुत दुख है.’
‘बाबा मरे नहीं, उन्हें मारा गया है. प्रशासन ने हत्या की हैं उनकी,’ भीड़ से कई आवाजें आने लगीं.
‘रात में बाबा को कहां ले जाया गया? जनता को जवाब चाहिए.’
‘मेरी बात सुनिए…. हमें बहुत दुख है इस बात का. मेरी मुख्यमंत्री से बात हुई. सीएम ने मोहन उत्तराखण्डी के परिवार के लिए पांच लाख की अनुग्रह राशि मंजूर की है. राजकीय सम्मान से उनकी अंत्येष्टि की जाएगी.’
‘रुपए नहीं चाहिए, सी एम को यहां बुलाओ. लाश तब तक नहीं उठेगी.’
‘हम मुख्यमंत्री को दस लाख देंगे, उनसे कहो गद्दी छोड़ दो.’
‘पोस्ट मार्टम के लिए ले जाने दीजिए, प्लीज. मौत का कारण जानना जरूरी है,’ डीएम का अनुरोध भीड़ ने नहीं सुना. बहुत मान-मनौवल के बाद कर्णप्रयाग में ही पोस्ट मार्टम की व्यवस्था की गई. बाबा का शव तिरंगे में लपेटकर रख दिया गया. जनता पंक्तिबद्ध हो अंतिम दर्शन करने और फूल चढ़ाने लगी. ‘बाबा ज़िंदाबाद’ के नारों से पिण्डर और अलकनन्दा की घाटी गूंजती रही. अंधेरा हो गया. रात तक अंतिम दर्शन करने वालों का आना लगा रहा. आधी रात बाद जब भीड़ कुछ कम हुई, प्रशासन ने आनन-फानन में शव गाड़ी में रखा और सतपुली की ओर निकल गए.
(Devbhoomi Developers Novel)
नवीन जोशी
यह लेख नवीन जोशी के शीध्र प्रकाश्य उपन्यास ‘देवभूमि डेवलपर्स’ का एक अंश है. ‘देवभूमि डेवलपर्स’ उपन्यास नवीन जोशी के उपन्यास ‘दावानल’ की अगली कड़ी के रूप में शीघ्र ही हिंदयुग्म प्रकाशन से प्रकाशित हो रहा है.
नवीन जोशी ‘हिन्दुस्तान’ समाचारपत्र के सम्पादक रह चुके हैं. देश के वरिष्ठतम पत्रकार-संपादकों में गिने जाने वाले नवीन जोशी उत्तराखंड के सवालों को बहुत गंभीरता के साथ उठाते रहे हैं. चिपको आन्दोलन की पृष्ठभूमि पर लिखा उनका उपन्यास ‘दावानल’ अपनी शैली और विषयवस्तु के लिए बहुत चर्चित रहा था. नवीनदा लखनऊ में रहते हैं.
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