तिब्बती समाज की बहुपतित्व परंपरा: एक ऐतिहासिक और सामाजिक विवेचन

तिब्बत और उससे जुड़े पश्चिमी हिमालयी क्षेत्रों का समाज लंबे समय तक भौगोलिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक रूप से बाहरी दुनिया से अलग रहा. इस अलगाव का प्रभाव वहाँ की सामाजिक संरचनाओं पर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है. विवाह, परिवार और संपत्ति से जुड़े नियम उन परिस्थितियों के अनुसार विकसित हुए जिनमें जीवन अत्यंत कठिन था. तिब्बती समाज में प्रचलित बहुपतित्व की परंपरा इसी संदर्भ में समझी जानी चाहिए. यह प्रथा आधुनिक समाज के नैतिक मानकों से देखने पर असामान्य प्रतीत होती है; किंतु ऐतिहासिक और पर्यावरणीय संदर्भ में इसका स्वरूप एक सामाजिक अनुकूलन के रूप में सामने आता है.

उन्नीसवीं शताब्दी के ब्रिटिश लेखक और यात्री, एंड्रयू विल्सन ने अपनी पुस्तक The Abode of Snow में तिब्बती बहुपतित्व पर विस्तार से चर्चा की है. यह पुस्तक 1875 में प्रकाशित हुई और इसमें विल्सन ने अपने छह महीने लंबे हिमालयी प्रवास के अनुभवों को दर्ज किया. अध्याय सत्रह, जिसका शीर्षक “Tibetan Polyandry” है, तिब्बती सामाजिक जीवन के एक ऐसे पक्ष को सामने लाता है जिस पर उस समय यूरोप में बहुत कम गंभीर चर्चा हुई थी. विल्सन की दृष्टि; औपनिवेशिक युग की सामान्य रूढ़ धारणाओं से पूरी तरह मुक्त नहीं है; फिर भी वे इस प्रथा को केवल नैतिक विचलन के रूप में प्रस्तुत नहीं करते.

तिब्बती बहुपतित्व का सबसे सामान्य रूप भ्रातृ बहुपतित्व था. इसमें एक स्त्री का विवाह एक ही परिवार के दो या अधिक भाइयों से होता था. विल्सन के अनुसार, ऐसे परिवारों में बड़े भाई को औपचारिक रूप से पति माना जाता था; अन्य भाई उसी वैवाहिक संबंध का हिस्सा होते थे और सभी बच्चे पूरे परिवार की संतान माने जाते थे. पितृत्व का प्रश्न व्यक्तिगत स्तर पर उतना महत्त्वपूर्ण नहीं था जितना कि पारिवारिक निरंतरता और सामूहिक उत्तरदायित्व.

इस प्रथा के पीछे सबसे महत्वपूर्ण कारण भूमि और संसाधनों से जुड़ा था. तिब्बत और उससे लगे क्षेत्रों में खेती योग्य भूमि अत्यंत सीमित थी; मौसम कठोर था; उत्पादन अनिश्चित था. यदि प्रत्येक भाई अलग-अलग विवाह करता और स्वतंत्र परिवार बसाता, तो पैतृक भूमि का विभाजन लगातार होता रहता. कुछ ही पीढ़ियों में भूमि इतनी छोटी इकाइयों में बँट जाती कि परिवार का जीवन निर्वाह कठिन हो जाता. बहुपतित्व ने इस विखंडन को रोका और परिवार को आर्थिक रूप से एक इकाई बनाए रखा.

एंड्रयू विल्सन इस तथ्य पर विशेष ध्यान देते हैं कि तिब्बती समाज में परिवार केवल भावनात्मक इकाई नहीं था; वह उत्पादन, श्रम और सुरक्षा की मूल संरचना था. एक ही पत्नी के अंतर्गत भाइयों का विवाह परिवार को श्रम के विभाजन की सुविधा देता था. कोई भाई पशुपालन करता; कोई दूरस्थ क्षेत्रों में व्यापार करता; कोई खेती और घरेलू प्रबंधन देखता. इस व्यवस्था में पुरुषों का लंबे समय तक घर से बाहर रहना असामान्य नहीं था; फिर भी परिवार की स्थिरता बनी रहती थी.

तिब्बती बहुपतित्व को समझते समय यह भी ध्यान देना आवश्यक है कि यह प्रथा किसी धार्मिक आदेश के रूप में नहीं थी. बौद्ध धर्म ने इसे न तो अनिवार्य बताया और न ही निषिद्ध किया. यह सामाजिक और आर्थिक आवश्यकताओं से विकसित हुई परंपरा थी. विल्सन उल्लेख करते हैं कि तिब्बत में एकपत्नीवाद और कुछ सीमित क्षेत्रों में बहुपत्नीवाद भी पाया जाता था; इससे स्पष्ट होता है कि बहुपतित्व कोई सार्वभौमिक नियम नहीं था, बल्कि परिस्थितिजन्य विकल्प था.

विल्सन की विशेषता यह है कि वे इस प्रथा की तुलना, यूरोपीय समाज की संपत्ति-आधारित व्यवस्थाओं से करते हैं. यूरोप में उत्तराधिकार और संपत्ति को सुरक्षित रखने के लिए जटिल कानूनी ढाँचे विकसित किए गए; तिब्बत में वही भूमिका सामाजिक परंपराओं ने निभाई. विल्सन के अनुसार, यदि किसी समाज की संस्थाएँ उस समाज को स्थायित्व प्रदान करती हैं, तो उन्हें केवल बाहरी नैतिक मानकों से आंकना उचित नहीं है.

तिब्बती बहुपतित्व के विषय में आधुनिक विमर्श प्रायः, स्त्री की स्थिति पर केंद्रित होता है. यह प्रश्न स्वाभाविक है कि ऐसे विवाह में स्त्री की स्वतंत्रता कितनी थी और उसकी सहमति किस रूप में कार्य करती थी. ऐतिहासिक स्रोत बताते हैं कि कई मामलों में स्त्री को परिवार के भीतर एक केंद्रीय स्थान प्राप्त था; घरेलू संसाधनों का प्रबंधन प्रायः उसी के हाथ में होता था. फिर भी यह मान लेना उचित नहीं होगा कि यह व्यवस्था पूर्णतः समानतावादी थी. सामाजिक शक्ति-संतुलन पुरुषों के पक्ष में ही रहता था; यह तथ्य विल्सन के विवरणों से भी अप्रत्यक्ष रूप से सामने आता है.

एंड्रयू विल्सन यह भी उल्लेख करते हैं कि तिब्बती समाज में बहुपतित्व को लेकर कोई सामाजिक लज्जा या छिपाव नहीं था. यह एक स्वीकृत और सामान्य प्रथा थी; बच्चों की सामाजिक स्थिति पर इसका कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता था. बाहरी समाजों में जिस प्रकार इस व्यवस्था को नैतिक विचलन के रूप में देखा गया, वैसा दृष्टिकोण तिब्बती समाज के भीतर मौजूद नहीं था.

बीसवीं शताब्दी में तिब्बत और हिमालयी क्षेत्रों में गहरे सामाजिक परिवर्तन हुए. राज्य की भूमिका बढ़ी; भूमि सुधार लागू हुए;शिक्षा और बाहरी संपर्कों का विस्तार हुआ. इन परिवर्तनों के साथ बहुपतित्व की परंपरा धीरे-धीरे समाप्त होती चली गई. आज यह प्रथा मुख्यतः ऐतिहासिक और मानवशास्त्रीय अध्ययन का विषय रह गई है.

तिब्बती बहुपतित्व का अध्ययन यह दिखाता है कि मानव समाज अपनी पर्यावरणीय और आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार कितनी विविध सामाजिक संरचनाएँ विकसित कर सकता है. एंड्रयू विल्सन की The Abode of Snow इस संदर्भ में एक महत्वपूर्ण स्रोत है; यह पुस्तक न केवल यात्रा-वृत्तांत है, बल्कि उन्नीसवीं सदी के हिमालयी समाजों का एक गंभीर दस्तावेज भी है. बहुपतित्व पर उनका अध्याय यह समझने में सहायता करता है कि किसी सामाजिक प्रथा को समझने के लिए उसे उसके अपने ऐतिहासिक संदर्भ में देखना आवश्यक है; बाहरी नैतिक धारणाओं से त्वरित निष्कर्ष निकालना अकादमिक दृष्टि से उपयोगी नहीं होता.

नोट : एंड्रयू विल्सन की पुस्तक The Abode of Snow (1875) के अध्याय “Tibetan Polyandry” के संदर्भ में.

-डॉ. लता जोशी

मूलतः गंगोलीहाट की रहने वाली डॉ. लता जोशी, उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान की असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हैं. फ़िलहाल हल्द्वानी शहर में रह ही, डॉ. लता जोशी, काफल ट्री की नियमित सहयोगी रही हैं. 

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