फोटो The Financial Express से साभार
कथा-सम्राट मुंशी प्रेमचंद, स्कूल-इंस्पेक्टर थे. वे अक्सर देहातों में दौरों पर रहते थे. आवागमन के साधन तब बहुत सीमित होते थे. मजबूरन उन्हें वहीं रुकना पड़ता था. कामकाज के बाद, जन जीवन को गहरे से ऑब्जर्व करना उनके मूल स्वभाव में शामिल था. अगर उनमें ये गहराई न होती, तो ‘ईदगाह’ और ‘पंच परमेश्वर’ जैसी दर्जनों मर्मस्पर्शी कहानियाँ, हिंदी साहित्य को कहाँ से मिलती. बच्चों का मेले के लिए मचलना, उत्साहातिरेक में आगे-आगे भागना, अपने खिलौनों के पक्ष में गर्वोक्तियाँ आदि बाल मनोविज्ञान की बातें, प्रत्यक्ष अनुभव किए बिना रचना में उकेरना संभव नहीं जान पड़ता. कुछ महीनों के लिए मुंशी जी की तैनाती बुंदेलखंड में भी रही. उस दौर में उन्होंने ‘हरदौल’ और ‘रानी सारंधा’ जैसी अप्रतिम कहानियाँ लिखी. समीक्षकों का तो यहाँ तक मानना है कि, यदि मुंशीजी का बुंदेलखंड से तबादला नहीं होता, तो ऐतिहासिक आख्यान लिखने वाले वृंदावन लाल वर्मा जी के कैरियर को खतरा पैदा हो सकता था. बहरहाल सीमित साधनों के उस युग में, दिन भर काम से थके- हारे मुंशीजी के धैर्य की सराहना करनी होगी. वे काम से लौटकर कैसे लालटेन की हाँडी माँजते होंगे, देखभालकर वर्तिका फिट करते होंगे. लालटेन में घासलेट भरते होंगे. तत्पश्चात् फाउंटेन पेन, स्याही कागज-हाशिया. तमाम सरंजाम.
जैनेंद्र जी, बड़े नफासत पसंद रचनाकार थे. स्टेनों को डिक्टेशन देकर रचना-कर्म किया करते थे. पूरे साज-बाज के बिना, उनका सृजन- कर्म आगे नहीं बढ़ पाता था.
आचार्य रामचंद्र शुक्ल, चारपाई में लेटकर पहले तकिए को पेट से लगाते थे, तब जाकर लिखना चालू करते. जब वे ऐसा न करते, तो उनका आलोचना-कर्म आगे न बढ पाता था.
महाकवि बच्चन अपने जमाने के बहुत बड़े कवि हुए. मधुशाला कई वर्षों तक हिंदी की बेस्ट सेलर बनी रही. बच्चन साहब के कामयाब बच्चे, अक्सर यूरोप जाते थे. जाने से पहले पिता से पूछते, “बाबू जी, आपके लिए वहाँ से क्या लाना है.” बच्चन साहब हमेशा ब्रैंडेड कलम मँगाते थे. उसके सिवा कुछ भी नहीं.
कालजयी उपन्यास ‘राग दरबारी’ के कुछ अंश तो श्रीलाल शुक्ल जी ने गाड़ी के बोनट पर टिकाकर लिखे. भागमभाग भरी नौकरी में, जो प्लॉट जहाँ पर दिमाग में आया, उसमें जरा भी देरी नहीं की. गाड़ी किनारे की और बोनट पर राइटिंग पैड टिकाकर वहीं पर लिख मारा.
श्रीराम शर्मा ‘आचार्य’ ने बड़ा संयमित जीवन जिया. प्रातः जागरण कर वे कुछ घंटे लिखते थे. वे थोड़े ही समय में इतना लिख डालते थे कि, उनके लिखे को आधा दर्जन टाइपिस्ट, कड़ी मशक्कत के बाद शाम होने तक टाइप कर पाते थे. ‘मैटर’ उसी रात प्रेस को चला जाता. एक अनुमान के मुताबिक, उन्होंने अपने जीवन काल में, अपने शरीर के वजन से सात गुना अधिक वजन के धर्म-साहित्य का सृजन कर डाला.
अब कुछ पाश्चात्य रचनाकारों के लेखन- कौशल की चर्चा.
मार्क ट्वेन, विंस्टन चर्चिल और जॉर्ज ऑरवेल बिस्तर पर लेटकर लिखने के लिए चर्चित थे, तो अर्नेस्ट हेमिंग्वे, चार्ल्स डिकेंस और वर्जीनिया वुल्फ खड़े होकर लिखने के लिए.
एंटन चेखव पेशे से चिकित्सक थे. वे चिकित्सा- कर्म में खूब व्यस्त रहते थे. लिखने के लिए मुश्किल से समय निकाल पाते. आधी रात में जब लिखने बैठते, तो स्टेथोस्कोप गले में लटकाए रखते थे. न जाने, किस घड़ी में चिकित्सक-धर्म निभाने जाना पड़े.
सार्त्र हाथों से लिखते थे. सभी लिखते हैं. लेकिन खास बात ये थी कि सात्र जब थक जाते थे, तो पैरों से लिखना चालू कर देते. दोनों हाथों से, समान दक्षता से काम करने वाले को अंग्रेजी भाषा में ‘एम्बिडेक्स्ट्रस’ कहते हैं, तो हिंदी में ‘सव्यसाची’. हाथ और पैरों से, समान दक्षता से लिखने वालों के लिए क्या कहें, वैयाकरणों का ध्यान अभी तक इस ओर नहीं गया.
इयान फ्लेमिंग (सुप्रसिद्ध जेम्स बॉन्ड सीरीज के लेखक) का टाइपराइटर स्वर्ण-धातु का बना हुआ था. तो यह बात पहले से तय थी कि, उस पर स्वर्णिम कथाएँ तो टाइप होनी ही थी.
व्लादीमीर नबोकोव (लोलिता के लेखक) बाथटब में बैठकर लिखते थे. नहाते जाते थे, लिखते जाते थे. एक पंथ दो काज.
आइंस्टाइन, स्नानागार से बाहर ही नहीं निकलते थे. बाथरूम की दीवारों पर इक्वेशन लिखते-लिखते स्नान-ध्यान भूल जाते थे. लोहिया जी अप्वाइंटमेंट लेकर उनसे मिलने गए. वे जब उनके घर पहुँचे तो आइंस्टाइन नहाने जा चुके थे. पूरे दिन लोहिया जी ने इंतजार किया. आइंस्टाइन जब बाहर निकले तो मेहमान से गर्मजोशी से मिलते हुए बोले, “आप तो बिलकुल टाइम से पहुँचे. ब्रेकफास्ट पर मिलने के वायदे को आपने खूब निभाया.” लोहिया जी आदमी मुखर थे. बोले, “काहे की पंक्चुएलिटी. मैं तो कल से बैठा-बैठा इंतजार कर रहा हूँ.” आइंस्टाइन अपने में खोए रहते थे. कल को आज समझने की भूल कर रहे थे. इक्वेशंस में तो टाइम को कॉस्टेण्ट मानते ही थे, सांसारिक जीवन में भी टाइम को कॉस्टेण्ट मान रहे थे.
गैब्रियल गर्सिया मार्केज, सीधे टाइप करते थे. रफ-वफ नहीं, डायरेक्ट फेयर . वो भी दोनों हाथों की दो उँगलियों से. वे मात्र तर्जनी से टाइप करते थे, शेष उँगलियों को विश्राम दिए रहते थे.
लेखन-कर्म पहले आसान नहीं था. कई तरह की तकलीफों से गुजरकर, रचना जन्म लेती थी. साहित्य सृजन के लिए रचनाकारों को क्या-क्या नहीं करना पड़ता होगा. लिख भी लिया, तो पांडुलिपि को कलेजे से सटाकर रखो. साहित्यकारों को हरदम यह आशंका बनी रहती थी कि, उनकी पांडुलिपि चोरी चली जाएगी.
एंड्रॉयड के आगमन ने सबकुछ आसान कर दिया. जिज्ञासा के आवरण में, आप आपत्ति उठा सकते हैं, कि कैसे? विज्ञान कहता है कि, जब कभी, किसी प्रकार का धर्म संकट अनुभव करो, तो तकनीक को युक्ति के रूप में आजमाओ. तकनीक की बदौलत, हमेशा से, परिश्रमी और दीर्घसूत्री जन एक ही धरातल पर खड़े दिखाई देते आए हैं. ऐसे में आप उदासीन या तटस्थ नहीं रह सकते, न ही मध्यस्थ बने रहने की सोच सकते हैं. सीधी भागीदारी- डायरेक्ट एक्शन.
एंड्रॉयड से एकसाथ कितनी सहूलियतें मिल गई. गिनने बैठो, तो गिनते-गिनते थक जाओगे. डिमाइज साइज का कागज छाँटने से छुट्टी. न फाउंटेन पेन की चिंता, न रोशनाई की. पहले तो यह चिंता सवार रहती थी कि, लिख तो दें, लेकिन लिखकर सहेजना भी तो पड़ता है. कहाँ रखा था, रखकर भूल गए. नाना प्रकार के झंझट.
सबसे बड़ी बाधा थी, आलस्य. अब न तो कलम की चिंता है, न कागज की. बत्ती गुल हो जाए, तो कोई फिकर नहीं. ‘बैकलाइट’ तो है न. न ‘पुअर हैंडराइटिंग’ की हीन भावना, न स्टेनो की चिंता. टाइपिंग स्पीड की भी कोई जरूरत नहीं.
ठाठ से खटिया पर लेटे रहो. शेषशायी मुद्रा में पैर पर पैर चढ़ा लो. फिर वाग्देवी का आह्वान करो. ठोक-बजाकर देख लो कि, जीभ पे सवार हुई कि नहीं. एंड्राइड उठाओ और आकाशमुखी होकर बोलना चालू कर दो. टेक्स्ट खुद-ब-खुद लिखता चला जाएगा. आधे घंटे में कहानी तैयार. वर्तनी में कुछ हिज्जे दुरुस्त करने बाकी रह जाते हैं. कभी-कभार बदमाशी कर जाता है. जैसा सुनता है, वैसा छापकर रख देता है. ‘प्रतिबद्धता’ को ‘प्रति घंटा’ छाप देता है तो ‘सुसाट-भुसाट’ को ‘सुसाइड-बायकॉट’. दिक्कत तब आती है, जब अपना दिमाग चलाने लगता है. हालांकि ऐसा बहुत कम होता है, बिलकुल नोमिनल मान लो.
खैर, दुरुस्ती न भी करो, तो कोई खास फर्क नहीं पड़ता. सुधी पाठक निहितार्थ समझ लेते हैं. आपके मूक प्रशंसक, अपने प्रिय रचनाकार का इतना लिहाज तो रखते ही हैं. रचनाकारों के लिए श्रमजीवी, हठयोगी और समयनिष्ठ होने की अवधारणाएँ अब अतीत की बातें होती जा रही हैं. पुराने लेखक लिखते-लिखते, क्लांत होकर विश्राम करते थे. एंड्रॉयड के प्रादुर्भाव से इतनी सुविधा हो गई है कि, आप विश्रामरत होकर भी लेखन-कर्म कर सकते हैं. ऑटोमेटिक सेव होता जाता है. स्वतः फाइल बनती चली जाती है. दीर्घसूत्री जन ध्यान से सुनें, उनके रचनाकार बनने में जो बाधाएँ थीं, अब पुराने जमाने की बातें होकर रह गई हैं.
एक अनुमान के मुताबिक, दुनिया में जितना खूबसूरत बोला गया है, उसका दशांश भी नहीं लिखा गया. बुद्ध, कबीर और आचार्य रजनीश ने लिखने के नाम पर एक अक्षर भी नहीं लिखा. समस्त ओशो साहित्य वाचिक परंपरा पर आधारित है. क्या शानदार साहित्य है. आचार्य रजनीश ने उसमें से एक भी अक्षर नहीं लिखा है. सब-का- सब बोला गया है. रिकॉर्डेड!
ललित मोहन रयाल
उत्तराखण्ड सरकार की प्रशासनिक सेवा में कार्यरत ललित मोहन रयाल का लेखन अपनी चुटीली भाषा और पैनी निगाह के लिए जाना जाता है. 2018 में प्रकाशित उनकी पुस्तक ‘खड़कमाफी की स्मृतियों से’ को आलोचकों और पाठकों की खासी सराहना मिली. उनकी दो अन्य पुस्तकें शीघ्र प्रकाश्य हैं. काफल ट्री के नियमित सहयोगी.
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