बहुत पहले की बात है. हिमालय की तलहटी में बसे एक घने जंगल और उसके पास बसे गाँवों में एक बंदर रहता था. उसका नाम था बहादुर पून. नाम के अनुसार वह सचमुच बहादुर तो था, लेकिन उसकी सबसे बड़ी ताक़त उसकी बुद्धि और समझदारी थी. जंगल के जानवर उसे प्यार से “बंदर बहादुर” कहते थे, क्योंकि वह बिना लड़े ही बड़ी-बड़ी मुश्किलें सुलझा देता था.
उसी जंगल में एक आदमखोर तेंदुआ आ गया था. वह रात के समय गाँव के पास मंडराने लगा. मवेशी डर के मारे चरना छोड़ चुके थे और गाँव वाले रात में दरवाज़े बंद करके बैठने लगे थे. कई बहादुर शिकारी आए, लेकिन तेंदुआ इतना चालाक था कि किसी के हाथ नहीं लगा.
गाँव की पंचायत में सब इकट्ठा हुए. कोई बोला, “अब तो गाँव छोड़ना पड़ेगा.” कोई बोला, “देवता ही हमें बचा सकते हैं.” तभी पेड़ पर बैठा बंदर बहादुर पून बोला, “डर से बड़ी कोई ताक़त नहीं होती, लेकिन समझदारी उससे भी बड़ी होती है.” लोग हैरान थे—एक बंदर क्या करेगा?
बहादुर पून ने योजना बनाई. उसने जंगल के जानवरों को इकट्ठा किया—हिरन, नीलगाय, जंगली सूअर, यहाँ तक कि भालू भी. उसने कहा, “हम सब मिलकर तेंदुए को हराएँगे, लेकिन ताक़त से नहीं, अक़्ल से.”
रात होते ही बहादुर पून ने गाँव के बाहर बड़े-बड़े पत्थर लुढ़कवा दिए. पेड़ों पर सूखी पत्तियाँ बाँध दीं. हवा चलने पर पूरा जंगल डरावनी आवाज़ों से भर गया. फिर उसने गाँव वालों से कहा कि वे मशालें जलाकर ढोल पीटें, लेकिन खुद सामने न आएँ. जब तेंदुआ आया, तो उसे हर तरफ़ से आवाज़ें सुनाई दीं—कभी पेड़ गिरने जैसी, कभी गुर्राने जैसी. मशालों की रोशनी में उसे लगा कि पूरा जंगल जाग गया है.
तभी बहादुर पून ऊँचे पेड़ से बोला, “ओ जंगल के चोर! यह इलाका अब जाग चुका है. यहाँ डर का राज खत्म हो गया है.” तेंदुआ घबरा गया. उसने सोचा, “यह जंगल पहले जैसा नहीं रहा. यहाँ तो सब मिलकर मेरा पीछा करेंगे.” डर के मारे वह उसी रात जंगल छोड़कर दूर पहाड़ों की ओर भाग गया. अगली सुबह गाँव में खुशी थी. लोग ढोल-नगाड़ों के साथ जंगल पहुँचे. किसी ने बहादुर पून को फल दिए, किसी ने मिठाई. गाँव के बुज़ुर्ग बोले, “आज हमें समझ आ गया कि असली बहादुरी लाठी या बंदूक में नहीं, दिमाग़ में होती है.” बंदर बहादुर पून पेड़ पर बैठा मुस्कराया और बोला, “जहाँ सब साथ हों, वहाँ सबसे बड़ा डर भी हार जाता है.”
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