पिछली कड़ी : उत्तराखंड विकास नीतियों का असमंजस
उत्तराखंड में पलायन मात्र रोजगार का ही संकट नहीं रहा, यह तो पिछले दो सौ सालों से हो रही हलचल से उपजीबहुआयामी संरचनात्मक विफलता दिखा चुका है. औपनिवेशिक उत्पीड़न के दौर से यहाँ खेती-किसानी जीवन निर्वाह या गुजारे तक सिमटती जा रही थी. यहाँ रहते नकद आय जुटाने की क्षमता चुक चुकी थी. बाजार तक पहुँच बनाने में पहाड़ी उत्पादों के लिए मूल्य श्रृंखला की कड़ियाँ अनुपस्थित थीं. पहाड़ के उद्योग-धंधों का इतिहास विकास प्रयासों की आड़ में यहाँ के नैसर्गिक साधनों की लूट के साथ नीतिगत असंगतियों का कुचक्र दिखाते रहा. परिवार आधारित लघु और कुटीर उद्योग दम तोड़ते रहे तो पढ़-लिख-प्रशिक्षण-सुविधा-अवसर के लिए पहाड़वासी को उसी के पहाड़ से बाहर निकल अलग पहचान बनानी पड़ी.
पहाड़ की हवा पानी से जिनके बदन में कुछ अलग लोच उभरती थी जो पहाड़ी किसी भी छोटे-मोटे काम और जरुरत के लिए एक धार से दूसरी धार को फलांग जाने का सीप सऊर जानते थे. ये अपने हाड़-मांस में तुरत-फुरत चुस्ती की धारक क्षमता छुपाए थे वो चल पड़े, बह निकले. अपनी सेवा, निष्ठा और कौशल से हर श्रम साध्य काम भी पाया और नाम भी बनाया. मानवपूंजी का आधार पाटी-कमेट-रिंगाल की कलम से शुरू किया. अंग्रेजी गणित के गुणा भाग में मास्साब के कितने चनकट खाए. हथेली पर लकीरें छपवाईं. गाड़-गधेरे पार कर जूनियर तो फिर कहीं हाईस्कूल. कुछ तो ऐसे ही चल पड़े. गों घर से भागे भी. कई शहरों और सुदूर मैदानों तक जा जूठे कप प्लेट भी धोए. चपरासी बने चौकीदार रहे कुक बने बाबू बने. वहीं बसे. अपने अपने मुकाम हासिल किये. विदेश भी जा पहुंचे. क्या करते गांव-देहात में दूर-दूर तक काम धंधे के अवसर न थे. राज्य की नीति उद्यम केंद्रितथी कहाँ? जिन लोगों में साहस वृति व उपक्रम योग्यता थी वह अपने बूते बाहर निकले. हर कर सकने वाला काम पकड़ा तो जान पहचान और बिरादरों की ठौर भी थामी. सरकार बहादुर को तो ऐसा सस्ता श्रम चाहिये ही था.
पहाड़ में खेती सिमट रही थी. जो उद्योग धंधे थे उन्हें राज्य ने अनुदान की खैरात पर पालने पोसने का इंतजाम रखा. लोक में प्रचलित शिल्प बिखरते गये. शिल्पियों की पुरानी पीढ़ी खत्म हो गई जिनके काम और अनुभव को भावी पीढ़ी ने अपनानानहीं चाहा. संक्रांति का पंचांग जब पन्ने पलटता तब गांव की सीमा से किशोर युवा और समर्थ दूर-दूर तक जाते धुंधला जाते. साल-छह महीने में आता मनीआर्डर,उनकी आशल-कुशल जताता. पर्व त्यौहार पूजा के अवसरों पर उनके पाँव फरकते. फिर आवत-जावत कम होती रही. गांव में बूढ़े, औरतें और बच्चे रह गये. घर-कुड़ी, बाखली-गोठ सूने पड़ गये. कई ठौर तो देबता को दिया-बाती जगाने वाला कोई न रहा.
खेती उजड़ी, परंपरागत धंधे बंद होने के कगार पर आए और अलग-अलग समय अवधि में पहाड़ में प्रचलित खेती, अनाज की कुटाई-पिसाई, सब्जी, मसाले, पशु पालन, हस्त शिल्प, खेती के औजार, लकड़ी के बर्तन, लोहे-ताँबे का काम से चलने वाली मिश्रित आजीविका पर संकट की छाया गहराती रही. इनके पीछे लोक थात थी. सदियों से चले आ रहे काम के तरीके थे. श्रम विभाजन और विशिष्टी करण था और सामाजिक स्तरीकरण भी. गांव में न्यूनतम लेकिन स्थिर नकद आय थी.
आज गांव में कच्चा माल है. गांव का अवलम्बन इलाका है. घास है. कई प्रकार की लता -बेल-झाड़ियां है. उपयोग का परंपरागत ज्ञान बड़े-बूढ़ो, दादी-आमा, सयानों-ज्ञानियों के मुख से सुनाई देता है. पानी है. जंगल है. साथ में वह असमंजस और भ्रमजाल है जिसके चलते खेतिहर का खेती से मन उचट गया. पहली जनगणना ब्रिटिश काल में 1881 में हुई.औपनिवेशिक चरण के आरम्भ में पर्वत स्वयं रहने योग्य था हालांकि खेती बाड़ी परिसीमित थी, आजीविका विकल्प कम थे. अल्पकालीन मौसमी प्रवास होते रहते थे. लोग गांव में रहते हुए अपनी जरूरतों के लिए बाहर जाते थे. 1901 से 1921 तक ग्रामीण क्षेत्र बेहद धीमी वृद्धि के दौर से गुजर रहे थे. 19 वीं सदी की शुरुवात से पहाड़ी इलाकों से लोग खाने-कमाने के लिए बाहर चल पड़े थे. यह पलायन का स्थायी चरण न था बल्कि आर्थिक बर्हिगमन का आरंभिक संकेत था.
आजादी के बाद भी खेती-पशुपालन जैसे आजीविका कार्यों में कोई खास सुधार न देखा गया. नकद रोजगार भी कम मिला. 1881 से 1991 के बीच पलायन के समंक सेंसस में तो उपलब्ध नहीं पर डॉ. टी. एस. पपोला व प्रो. खनका आदि विद्वानों के नतीजे बताते हैं कि पलायन निरंतरता युक्त होता गया. 1980 के बाद मैदानी व शहरी इलाकों में उद्योग व सेवा विस्तार होता रहा पर पहाड़ में ऐसे आर्थिक अवसर नगण्य ही रहे. बेहतर इलाज की सुविधा व लिखाई पढ़ाई के लिए पहाड़ से शहरी इलाकों की ओर जाना व रोजगार के अवसर पाने के लिए पलायन नब्बे के दशक में और बढ़ा.
2001 से 2011 की अवधि में यह रफ्तार और भी अधिक हो गयी. अब पहाड़ के गाँवों में जन वृद्धि दर 0.7% थी तो मैदानी इलाकों में 2.82%.यह संकेत था कि गाँव से आबादी कम हो कर शहर /मैदान गई. अल्मोड़ा और पौड़ी जैसे जनपदों में इस दशक में कुल आबादी में ह्रास दिखा जो सुस्थिर पलायन का संकेत था. 2011 के सेंसस में पहाड़ के 1,048 गांव पूरी तरह खाली दिखाई दिए. 2008 से 2018 के बीच 5.02 लाख में 3.8 लाख अस्थायी व 1.1 लाख लोग स्थायी रूप से गांव छोड़ चले थे. 2018 से 2022 में 3.07 लाख अस्थायी व 28,631 लोग स्थायी रूप से पलायन कर गए. 2011 से 2022 के बीच खाली गाँवों की संख्या 1,792 हो गई.
यह स्पष्ट करना जरुरी है कि सेंसस-जिन्होने अपना जन्म/पहला निवास स्थान दूसरी जगह दर्ज कराया है को प्रवास के रूप में दर्ज करता है. दूसरी तरफ सरकार /माइग्रेशन कमीशन (2008-22)प्रत्यक्ष पलायन परिणाम देता है जो आर्थिक प्रवास का सही पैमाना बनता है.
औपनिवेशिक काल 1881 से प्रथक उत्तराखंड राज्य में 2011 तक यह दिखाई देता है कि शुरू से मौसमी प्रवास होने लगा था, जब खेतीबाड़ी ही जीवन निर्वाह का साधन थी. 1900 से 1947 तक मौसमी काम के साथ सेना की भर्ती व वाहय रोजगार के अन्य अवसरों की तलाश से लोग जाते रहे. 1947 से 1981 की अवधि में विकास योजनाएं मैदान केंद्रित रहीं. 1962 में चीन के आक्रमण के बाद सीमांत इलाकों में सड़क निर्माण ने जोर पकड़ा. 1981 से 2001 की समय अवधि देश में आतंरिक स्थायित्व व वाहय असंतुलन का प्रदर्शन कर रही थी. फिर वैश्विकरण का दौर आया. नगर-महानगरों के विस्तार के साथ पहाड़ से पलायन भी तेज हुआ. 2001 से 2011 की अवधि में भुतहा गाँवों की संख्या 1048 हो चुकी थी. पहाड़ में संसाधन आधारित आजीविका टूटने के कगार पर थी. शुरुवात में हुई मौसमी यात्रा वाहय आव्रजन की ओर गतिमान थी. कोरोना काल में लोग लौटे पर उसके बाद अवसरों की कमी से स्थिति फिर उसी दुश्चक्र से घिरी दिखी.
उत्तराखंड में 2011 के सेंसस के अनुसार जनसंख्या ~1 करोड़ थी जिसमें 43.17 लाख लोग यानी 43% माइग्रेंट थे, आशय यह कि इनके जन्मस्थान के अलावा कहीं और रहना दर्ज है. इनमें से लगभग 70% ग्रामीण से शहरों की ओर राज्य के भीतर या बाहर गए. इनमें आधे से अधिक लोगों की सर्वेक्षण सूची में वह स्थान शामिल हैं जहाँ वह बस गए या वहां का पता दर्ज कराया गया है. यह सीधे पलायन का संकेत नहीं है पर इससे ज्ञात होता है कि जीवन यापन के लिए पहाड़ से निकल इन अवसर व सुविधा वाले स्थानों को चुना गया. ग्रामीण क्षेत्रों से आबादी का एक तिहाई हिस्सा पिछले बीस वर्षों में बाहर निकल चुका. प्रति हजार में सौ गावों में सौ से भी कम लोग निवास कर रहे.
उत्तराखंड पलायन आयोग की रिपोर्ट के अनुसार 2008 से 2018 के बीच 1,18,981 लोग स्थायी रूप से पलायन कर गए तो 3,83,726 लोग काम रोजगार के लिए आते-जाते रहे. 2018 से 2022 की अवधि में स्थायी रूप से 28,531 व अस्थायी रूप से 3,07,310 लोगों ने पलायन किया. 2022 तक 1,792 गांव भुतहा याने आबादी विहीन हो गए. विगत वर्षों में कोरोना काल के बाद 6,282 युवाओं की गांव वापसी हुई जिनमें कुछ ने जैविकीय खेती, स्वरोजगार व पर्यटन गतिविधियों को अपनाया पर सफलता की यह कहानियाँ सीमित ही रहीं. पलायन का मुख्य समूह 25 से 35 वर्ष के युवा रहे जो वापस लौटे उनमें से आधे से अधिक इसी आयु वर्ग के थे. इससे यह संकेत मिलता है कि स्थानीय रोजगार सृजन पर असरदार नीति से पलायन में भारी बदलाव आना संभव था.
अब जैविकीय पदार्थ हैं, श्री अन्न का प्रचार-प्रसार है. कौशल निर्माण की संस्थाओं का मेला जुट जाता है पर अब भी आम किसान व कारीगर के लिए बाजार की मंडी दूर है.
उस तक पहुँच नहीं है. डिज़ाइन, ब्रांड व लॉजिस्टिक्स नहीं है क्योंकि उस तक पहुँचने का उपक्रम अभी बाकी है. गांव के उद्योग सिमटते दिख रहे. जो भी गांव में रह परंपरागत तकनीक के आसरे वस्तु बनाते रहे उनको शिकायत रही कि हाड़-तोड़ कर भी लागत नहीं निकलती. आय कम होती जा रही. अब कुशल कामगार भी गांव से बाहर कस्बे और नगर-महानगर की ओर निकल गया. पारम्परिक उद्योगों के पतन से ज्ञान व कौशल का पीढ़ी-दर-पीढ़ी में जो क्रमिक हस्तान्तरण होता था उसका सिलसिला उसकी कड़ियाँ ही सिमट गई. ऊन का काम, लकड़ी और धातु के बर्तनों का काम,वो नक्काशीदार खिड़की दरवाजे, मिट्टी पत्थर की दीवारों में किये सुराख़ से आते जाते मौन, रिंगाल और बांस के साथ कई किसम के काष्ट व मजबूत लकड़ी से घर, खेत व पशुओं का सामान बनाने वाले शिल्पकार, लोहे और ताँबे के पात्र-बर्तन बनाने वाले हुनरमंद व उपयोगी वनस्पतियों और जड़ी बूटी का ज्ञान रखने वाले बुबू और आमा, वैद्यकी और ज्योतिष के साथ कर्मकांड का पारम्परिक ज्ञान रखने वाले परिवार जिनसे गांव व इलाके का नाम फैलता अब लुप्त होते दिखा.
लोक परंपरा का वृहत स्वरूप संकीर्ण होते रहा. लोक थात उजड़ गई. कौशल व उपक्रम का खालीपन बढ़ा. यह निर्वातपहाड़ के परंपरागत पेशों और उद्योगों को धीरे-धीरे पतन की ओर धकेलने का कारण बन गया और साथ में पलायन का रास्ता भी खोलता गया.
पहले गुजारे लायक खेती थी. फिर लगान लगा. बंदोबस्त हुआ. पहाड़ की खेती उजड़ने के कारण बहुत साफ हैं. सीमांत जोत का आकार बहुत छोटा है. खेत बिखरे हुए हैं. सिंचाई के लिए गूल अपर्याप्त हैं, खेती इन्द्र देव की कृपा पर निर्भर है. फिर भी खाद्य आधारित फसल महत्वपूर्ण बनी रहीं जिसमें मोटा अनाज, मसाले, सब्जी व फल शामिल रहे. खाद्य पदार्थ आधारित उद्योग जिसमें किसान द्वारा उत्पादित मोटा अनाज, मसाले मुख्य हैं जैविकीय खेती के उत्कृष्ट उत्पाद बने. मडुआ,गहत भट्ट, रेंस उड़द, गडेरी व अन्य मसालों, पहाड़ी पीली व लाल मिर्च जैसे पहाड़ी उत्पादों की मांग बराबर रहती है. मंडी व शहर तक इन्हें मध्यस्थों के द्वारा पहुँचाया जाता है. ऐसे में किसान को इनकी उचित कीमत नहीं मिलती. ऐसे में उत्पादन बढ़ाने के लिए आवश्यक न्यूनतम प्रयास नहीं किये जाते. जब से मोटे अनाज को सरकार द्वारा श्री अन्न के रूप में प्रचारित प्रसारित किया गया तो जैविकीय उत्पादों की बाजार मांग बढ़ी और कीमत भी. सामान्यत: पेंतिस से चालीस रूपये में मिलने वाला मडुआ बाजार में सत्तर अस्सी रूपये में बिकने लगा. मॉल व एनजीओ तो अपने ब्रांड नाम और ऊँची कीमतों पर बिक्री करने लगे. अन्य पहाड़ी उत्पादों की भी यही कहानी है जहाँ उनकी बढ़ती कीमत उसे उत्पादित करने वाले किसान को कोई फायदा नहीं पहुँचाती.
सहकारी स्तर पर किसान को फायदा पहुंचाने के कई प्रयास हैं. उदाहरण के लिए धाद संस्था ने माल्टा महोत्सव देहरादून में शुरू किया जहाँ माल्टा साठ रूपये किलो में बिका. सरकारी खरीद के भाव छह रूपये-दस रूपये ही तय होते दिखे. पहाड़ का जड़ी बूटी – भेषज व सुगंध उद्योग पर अति विदोहन की मार पड़ी. उत्तराखंड के पर्वतीय भू-भाग में दो हज़ार से ज्यादा औषधीय वनस्पति पाई जाती है जिनका सम्यक उपयोग न हुआ. इनमें से कई भेषज अब दुर्लभ की श्रेणी में आ गईं हैं कारण है इनका अति विदोहन. जो पहाड़ी उत्पाद सरस मेलों व अन्य महोत्सव में बिकने रखे जाते हैं उनकी कीमतों पर कोई नियंत्रण नहीं है. ऐसे में मांग समर्थ होने पर भी इनकी बिक्री पर बट्टा लगता है. यदि उत्पादों में मूल्य संवर्धन हो तो इनकी उत्पादन क्षमता व गुणवत्ता में सुधार निश्चित है.
ग्रामीण दस्तकारी व शिल्प ने भी बुरे दिन देखे हैं.
ऊन व हथकरघा पहाड़ में खास कर सीमांत में अपनी गुणवत्ता, डिज़ाइन व शुद्ध ऊन की खासियत से परिवार उद्योग बना रहा जिसमें परिवार के हर सदस्य की भागीदारी रहती थी. 1962 में चीनी आक्रमण के बाद इस उद्योग पर भारी आघात हुआ जब भारत-तिब्बत व्यापार रुक गया. घर-घर ऊन की कताई बिनाई और इनसे बनी वस्तुओं के उत्पादन को मशीन से बने सस्ते कैशमिलोन से कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ा. महिलाओं का घरेलू रोजगार खतम हुआ तो पुरुष अन्य धंधों से आय कमा परिवार चलाने के लिए शहर गए. परंपरागत तकनीक से चलने वाले कई छोटे उद्योग बाजार में सस्ते बिक रहे माल से प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाये.
रिंगाल, बांस, काष्ट शिल्प में कच्चे माल का संकट वन कानून व अधिनियम के फेर बदल से पैदा हुआ. लोहे और ताँबे के बर्तनों का बाजार भी धीरे धीरे मंद हुआ. इनकी कारीगरी करने वाले शिल्पी भी हर पीढ़ी कम होते रहे. पहाड़ से खनिज व कच्ची धातुओं का खनन जोर पकड़ता रहा. इससे गांव की खेतिहर व्यवस्था बिगड़ी.
ब्रिटिश काल (1815 से 1947) में संयुक्त प्रान्त व फिर उत्तरप्रदेश के पर्वतीय क्षेत्रों में रोजगार, नौकरी और पलायन की स्थिति को यहाँ की आर्थिक गतिविधियों एवम प्रशासनिक ढांचे के साथ देखा जा सकता है. अंग्रेजों ने कुमाऊं-गढ़वाल के रणनीतिक सीमा क्षेत्र तिब्बत-नेपाल बफर को सस्ते सैनिकों के स्त्रोत एवम बहुल वन सम्पदा क्षेत्र के रूप में पाया. तभीब्रिटिश काल में रोजगार के प्रमुख स्त्रोत में सेना सबसे बड़ी नियोक्ता थी जिसने पहले और दूसरे विश्वयुद्ध की अवधि मेंगढ़वाल-कुमाऊं रेजिमेंट में भारी भर्ती की. कहा जाता रहा कि तीसा की महामंदी के बाद 1945 तक हर दस पहाड़ी परिवारों में एक युवक फौज में जाता दिखा. यह “स्थानीय रोजगार” नहीं बल्कि “स्थायी वाहय रोजगार” था. इसके बाद भर्ती का केंद्र बना जंगलात महकमा जिसमें वन रक्षक और वन मजूरों को लिया गया. यह सिलसिला 1865 और 1878 के फारेस्ट एक्ट से शुरू हो गया था जब वनों का ज्यादा से ज्यादा दोहन करने के उद्देश्य से राष्ट्रीयकरण कर दिया गया था. इसमें आम पहाड़ियों को मेट-मजदूर, चौकीदार और वन रक्षक का ओहदा दिया गया. जंगलात का पतरौल जंगल से घास-पात और सूखी लकड़ी इकट्ठा करने गई औरतों के लिए भय का कारण बना. नीतिगत झोल यह रहा कि गांव वालों से जंगल छीने जाएं और वन विभाग की निरंकुश नीतियों का दबदबा बना रहे.
ब्रिटिश शासन के पहले दौर में सिविल प्रशासन का दायरा सीमित था. अंग्रेज सरकार ने पहाड़ी इलाकों में जो नौकरियां दीं उनमें बड़ी हिस्सेदारी मैदान के लोगों की रही. पहाड़ी इलाके के लोग दस प्रतिशत से ज्यादा न थे और ये भी निम्न श्रेणी के पद रहे. इसका कारण साफ था कि स्थानीय किशोर व युवा कम पढ़े-लिखे थे. जूनियर स्तर से ऊपर के स्कूल सीमित थे. धीरे धीरे स्कूलों की संख्या बढ़ी और मिसनरी संस्थाऐं स्कूल और स्वास्थ्य सुविधा देने को आगे आने लगीं.
ब्रिटिश काल से ही मौसमी प्रवास होता रहा था. जाड़ों में परिवार का मैदान जा कर रहना उन परिवारों के लिए संभव बना जिनकी हैसियत अच्छी थी व सम्बन्धी मैदान में रहते थे. इस प्रवास की प्रवृति ऐसी थी कि गांव छोड़े नहीं जाते बल्किरोजगार मिलने, पढ़ाई लिखाई की सुविधा प्राप्त करने, तकनीकी प्रशिक्षण प्राप्त करने और नए-नए अवसरों की खोज में गांव से बाहर निकलना एक धीमी पर सतत प्रक्रिया बनी.
आजादी के बाद विकास की लहर के साथ यह उम्मीद रखी जाने लगी थी कि पहाड़ के गाँव स्वावलम्बी बनेंगे व स्थानीय रूप से रोजगार भी उपलब्ध होगा जिससे यहाँ की जीवन निर्वाह खेती और परंपरागत व्यवसाय को सहारा मिलेगा. इसे नीतियों का असमंजस ही समझें कि गिने चुने ब्रिटिश सरकार के समय से प्राथमिकता प्राप्त पर्वतीय शहरों से हट अन्य इलाके पिछड़ा क्षेत्र ही बने रहे. नियोजित विकास के दौर में पहाड़ के पारम्परिक उद्योगों के संवर्धन की सुध योजनाओं की प्राथमिकता में न थी. हेरोड-डोमर के पूंजीगत विनियोग मॉडल में पूंजी की औसत व सीमांत प्रवृत्तियों पर जोर था और ये ऐसी अर्थव्यवस्था के लिए तैयार था जहाँ साधनों का पूर्ण रोजगार स्तर पर होना जरुरी था. पर पहाड़ी अर्थव्यवस्था तो हक़-हकूक गंवा चुकी थी और भूमि बंदोबस्त के भंवर में थी. दूसरी योजना महालनोबिस के चार क्षेत्रीय मॉडल पर विस्तरित थी. जो पूंजी के भारी विनियोग व दीर्घ समय अवधि अंतराल के बाद उत्पादन देती. उत्तर प्रदेश के मैदानी इलाकों में लघु व कुटीर उद्योगों के विकास के सापेक्ष पहाड़ में इनकी दशा विगलित होती गई. हुआ तो यह कि रोजी रोटी की तलाश में इनके हुनरमंद कारीगर व शिल्पी भी गांव छोड़ गये. कुशल व अर्ध कुशल श्रम मैदान में अकुशल मजदूर की हैसियत से दिहाड़ी पर लग गया. असंगठित क्षेत्र फैलता गया. तीसरी योजना की शुरुवात से ही देश बढ़ती कीमत और गिरते रोजगार में फंसा.
उत्तर प्रदेश के पहाड़ी इलाकों से पलायन 1960 के दशक से और बढ़ा. नियोजित विकास के महालनोबिस मॉडल से देश के शहरी भागों में उद्योग की गतिविधियां असंतुलित गति से बढ़ती दिख रही थीं. पहाड़ से अकुशल श्रम का रिसाव असंगठित क्षेत्र में होने लगा. तब तक जंगलात पर रोक टोक भी बहुत बढ़ गई थी जिससे परिवार स्तर पर चलने वाले कुटीर कामधंधे कच्चे माल की कमी से दम तोड़ने लगे थे. पहाड़ में प्रशिक्षण संस्थाऐं व पॉलिटेक्निक नाम मात्र के थे. शिक्षा रोजगार के साथ सह संबंधित रही नहीं. अब जो लोग मैदानों में खासकर दिल्ली लखनऊ इलाहाबाद के सरकारी कार्यालयों व अन्य शहरों में अन्य तकनीकी काम पा गए थे अब अपने नये ठौर ठिकाने में परिवार भी साथ रखने आरम्भ कर चुके थे.
ब्रिटिश काल में फौज और कुली मजूर तो उत्तर प्रदेश में तमाम तरह की सरकारी-गैर सरकारी नौकरी के लिए पलायन का सिलसिला शुरू किये पहाड़वासी अपने काम के प्रति ईमानदारी और निष्ठा के लिए जाने गये. ब्रिटिश काल में हुए प्रवास से गांव बसे रहे पर आजादी के बाद गांव खाली होने लगे. ब्रिटिश काल में नीति व्यूहपरक थी तो उत्तर प्रदेश में उपेक्षा पूर्ण. ब्रिटिश काल में शोषण था पर गांव का ढांचा बचा रहा. यूपी के समय लोकतंत्र था पर आजीविका खत्म होती रही. अंग्रेजी राज ने पहाड़ से पुख्ता आदमी लिया तो यूपी ने पहाड़ से भविष्य. अंग्रेजी राज से ही पहाड़ के निवासी का काम के प्रति समर्पण पहचान में आया जो उसने बहुत कष्ट सहन कर गांव से बाहर निकलने की मज़बूरी के साथ हासिल किया था. अपने परिवार का जीवन स्तर उठाने के क्रम में जैसे भी बन पड़ा उसने अपने बाल बच्चों की पढ़ाई लिखाई पर बहुत जोर दिया जिसने आगे चल उत्तराखंड के वासियों को विकास की मुख्य धारा में शामिल करने में सही दृष्टि प्रदान की. आजादी के बाद शिक्षा संस्थाओं में भी वृद्धि हुई हालांकि इनकी नींव अंग्रेजी शासन काल में पड़ चुकी थी. मिशनरी गतिविधियों में स्वास्थ्य सेवाओं पर भी बहुत ध्यान दिया गया था.
उत्तराखंड से संरचनात्मक पलायन की जड़ें ब्रिटिशकाल में ही पड़ चुकी थीं. इससे पहले केवल मौसमी/सीमित प्रवास था. 18वीं सदी में पहाड़ आत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्था थी जहाँ कृषि, पशुपालन व हस्तशिल्प विकसित था. बाहरी निर्भरता सीमित थी. लोग बाहर जाते थे पर घर नहीं छोड़ते थे. ये चक्रीय प्रवास कहा गया पलायन नहीं. 1815 के बाद गोरखाओं के साथ युद्ध के बाद ब्रिटिश शासन आया तो नीतिगत हस्तक्षेप बढ़े और पलायन की नींव पड़ी. अब ऐसी भूमि व राजस्व नीति थोपी गयी जिससे पारम्परिक सामुदायिक भूमि व्यवस्था भंग हुई और नकद लगान शुरू हुआ. भूमि को राजस्व स्त्रोत बना दिया गया जिससे पहाड़ी खेती अलाभकारी बनती गयी नकद कमाने के लिए पहाड़वासी माल यानी मैदान की ओर उतरने लगे.यह पहला धक्का था. फिर 1865 और 1878 में इंडियन फारेस्ट एक्ट के नाम से गांव वालों के हक़ हकूक छीनने वाला जंगल राज आया. जानवरों की गांव के अवलम्बन इलाके से चराई, चूल्हा जलाने के लिए जंगल की सूखी लकड़ी, जड़ी-बूटी, फल फूल बीनने-इकट्ठा करने पर रोक लगी. अब जंगल राज्य की संपत्ति बना. लगान बढ़ने से खेती से गुजारा मुश्किल हुआ. चारे की कमी से दूध घी दन्याली कम तो वन उपज की रोकटोक से परंपरागत कुटीर उद्योग का पतन अगला जोर का झटका था.
पहाड़ में हक़-हकूक परम्परागत अधिकार ही न था वह खेती बाड़ी, पशु पालन व सामाजिक संगठन की संयुक्त प्रणाली था. ब्रिटिश राज में भूमि बंदोबस्त व वन कानूनों को जबरन लागू कर इसे विगलित कर दिया गया जिसने आने वाली पीढ़ियों के लिए खेती को अलाभकारी ही नहीं बनाया बल्कि आजीविका कर संकट खड़ा कर संरचनात्मक पलायन का घेरा बढ़ाया. आजीविका के संकट के धक्के से मैदानी क्षेत्रों में दिख रहे अवसरों की ओर खिंचना ही धक्का देने व खींचने के प्रवास सिद्धांत का आधार बना. हक -हकूक राज्य-समुदाय व प्रकृति के संबंधों को जताने के साथ, सामुदायिक अधिकार बनाम राज्य स्वामित्व को स्थापित करता संस्थागत आर्थिक तंत्र था.
पहाड़ सस्ते श्रम आपूर्ति कर्ता के रूप में देखा गया जहाँ से ब्रिटिश फौज के रंगरूट, आम और खास काम के मजूर और बागान के कुली निर्यात होने लगे. सबल श्रम का यह बर्हिप्रवाह संस्थागत क्रिया बनी जो आकर्षण घटक या पुल फैक्टर था जिससे धक्का और बढ़ा. शासन के लिए पहाड़ बफर जोन रहा. गढ़वाल राइफल्स, कुमाऊं रेजिमेंट में भर्ती, चाय बागान व रेलवे के लिए कलकत्ता की ओर मजूरों का प्रवाह और राजकाज व दौड़ -भाग के मुंशी आसानी से जुटते रहे. आजादी के समय तक पलायन की प्रकृति संरचनात्मक हो चुकी थी. सस्ते श्रम के ऐसे कैचमेंट में अब कुछ पढ़ लिख गये व अर्धकुशल लोगों की संख्या भी बढ़ चली थी. आजादी के दौर में आत्मनिर्भर गांव की सम्भावनाओं की बात चली पर संयुक्त प्रान्त /उत्तर प्रदेश में भी पहाड़ी इलाकों की उपेक्षा का क्रम वही रहा. उद्योग जो स्थापित हुए उनका आधार मैदानी इलाका ही रहा. पहाड़ की अंतरसंरचना दुर्बल जो थी. हक-हकूक के आर्थिक पक्ष खेती-जंगल-पशु पालन के घेरे में थे. जंगल से घास-चारापत्ती, पशु धन में दूध, गोबर, खेत से उपज का घेरा हक-हकूक के टूटने से सिमटता रहा. सामुदायिक श्रम और जोखिम साझेदारी में हेरू-पेरू व मिलजुल कर काम का रिवाज टूटने लगा. हक-हकूक के रिसाव ने लोक थात को झटका दिया, यह सामाजिक-सांस्कृतिक व मनोवैज्ञानिक पतन के साथ जोरदार संरचनात्मक झटका था.
पहाड़ में बंदोबस्त ने खेतिहरों की कमर तोड़ दी. यह एक ऐसा सिलसिला था जिसने ऐतिहासिक, प्रशासनिक और नीतिगत कारणों से उनके जीवन यापन और चली आ रही दिनचर्या को असहज कर दिया. अब राजस्व के नये कठोर नियम थे जिनसे देखते ही देखते पहाड़ की खेती के ढांचे को कमजोर कर दिया. ब्रिटिश कालीन बंदोबस्त में पहाडों की खेती को मानसून आधारित, जोखिमपूर्ण व अल्प उत्पादक मानने के बजाय मैदानों सी कृषि मान लिया. पहाड़ में अति वृष्टि, सूखा, भू कटाव सी कोई भी आपदा रहे, लगान तो भरना ही पड़ता. पहाड़ की खेती के जोखिम के साथ बढ़ते कर भारी बोझ बने.
सामुदायिक खेती का अंत खसरा-खतौनी की परिपाटी ने कर दिया. बंदोबस्त से पहले नौला, धारा, चारागाह, जंगल, जमीन सब सामुदायिक उपयोग की थी. जमीन को व्यक्तिगत खातों में बाँट दिया गया जिससे भूमि जोत सिकुड़ती गयी.हेरू-पेरू, धूरा-पानी जैसी मिल जुल कर की गईं श्रम व्यवस्थाऐं मृतप्राय हो गयीं. फलत: खेती पाती, घास चारा,कामधंधे की बढ़त थम गयीं और लागतें ऊपर उठीं.
जमीन को उपजाऊ और अनुपजाऊ श्रेणी में रखने की पैमाइश मनमाने ढंग से हुई. सरकारी कारिंदों ने बंदोबस्त करते हुए ढालू खेत, बारानी खेत व सीढ़ी दार खेतोँ को निम्न श्रेणी में डाल दिया. तलाऊं भूमि से हट उपरांऊ में यही पहाड़ की पारम्परिक खाद्य सुरक्षा थे. अब खेती पर न तो पूंजीगत विनियोग बढ़े न राज सहायता मिली. गूल से होने वाली सिंचाई भी सुधार योजनाओं से बाहर हो गयी.
दूसरी ओर जंगलों के बंदोबस्त से आम जन परंपरा से चले आ रही पशु चराई, रेशा रस्सी के लिए झाड़ी-लता व बेल व खाना पकाने की जलौनी लकड़ी व घर मकान हेतु ईमारती लकड़ी प्राप्त करने में असहज हो गया. पशुपालन में संकट छाया. गोबर और खाद भी कम पड़ने लगे. खेती का चक्र दुर्बल पड़ा. खेती और पशु पालन पहाड़ की रीढ़ थे, बंदोबस्त ने इसकी सन्धियों में घात कर दिया. पहले वनों के तप्पड़ो, खर्क, थात व बुग्याल में सामूहिक चराई की परम्परा रही. मौसम के हिसाब से जानवर ठंडी से गरम जगह ले जाए जाते. इनके गोबर से जमीन उपजाऊ रहती. वहीं जमीन से जुड़े हक में परती भूमि पर खेती की जा सकती थी. सीढ़ीदार खेतोँ का विस्तार किया जा सकता था. नौला-धारा जैसे प्राकृतिक जल स्त्रोतों पर सामूहिक स्वामित्व होता था. सामाजिक-आर्थिक हक में लगान सामूहिक रूप से अदा करने, अकाल-आपदा में इसपर छूट व श्रम विनिमय प्रचलित था. हक-हकूक आजीविका के साथ परिस्थितिकी व गहन सामाजिक ताने-बाने का संयोजन था.
बंदोबस्त व्यवस्था में जमीन का व्यक्तिगत खाताकरण हो गया. सामुदायिक जमीन गायब हो गयी व नकद लगान अनिवार्य हो गया. 1865 के पहले वन अधिनियम, 1865 के कठोर वन अधिनियम व 1927 के भारतीय वन अधिनियम ने गांव के जंगलों को रिज़र्व /संरक्षित की श्रेणी में डाल दिया. हक के बदले रियायत या छूट के प्राविधान बने. पहले जो अधिकार थे अब अपराध बने.
फसल हो न हो लगान नकद वसूला जाता. उपज की बिक्री कर आय की हैसियत कम ही काश्तकारों की थी. खेतिहर अब जमींदार, लाला-बनियों के उधार के जाल में फंसने लगे थे. लगान चुकता न हो तो जमीन जब्त हो जाती. सूद मूल न चुके तो घर-कुड़ी. सन 1880 के बाद जीवन निर्वाह के संकटों से बाहर छिटकने के लिए घर परिवार के सदस्य पहाड़ की सरहदों को लाँघने लगे. सन 1881 से आगे की जनगणना प्रवृत्तियां दिखाती हैं कि जब जब आमजन के सामुदायिक अधिकारकमजोर हुए तभी अपना घर बार छोड़ पलायन करना ही गुजारे का सहारा बन गया.
आजादी मिलने के बाद आत्मनिर्भर गाँवों की परिकल्पना के बावजूद बंदोबस्त की मानसिकता न बदली. संयुक्त प्रान्त,उत्तरप्रदेश व फिर उत्तराखंड राज्य में बंदोबस्त अद्यतन तो हुआ पर पहाड़ी खेती के हिसाब से नहीं.अब तो खेतिहर जमीन का गैर कृषि उपयोग भी बढ़ने लगा था. उपज का न्यूनतम समर्थन मूल्य भी तय न था. बंदोबस्त से किसान ऐसा भूमिधारक बन गया जिसे लगान चुकाना ही होता अब वह खाद्य सुरक्षा प्रदाता न था और न ही पारिस्थितिकी का रक्षक. न तो किसान को सम्मान मिला और न कृषि को संरक्षण.
जंगल और खेत के अलगाव से उत्पादन का चक्र खंडित हुआ. जमीन के विखंडन से खेती हानि का सौदा. लगान के बोझ से उधार बढ़ा. सामुदायिक घेरे के संकुचन से सामाजिक पूंजी का रिसाव हुआ. नीतिगत उलट फेर ने पहाड़ के काम काज को उदासीन कर दिया, खेती उत्साह व उमंग से भरा पर्व न हो राजस्व का भोंतरा हथियार बन कर रह गयी.
बंदोबस्त व्यवस्था ने जमीन का व्यक्तिगत खाताकरण कर दिया. साझी जमीन गायब हो गयी और नकद लगान अनिवार्य हो गया. जमीन -जंगल पर राजा और राज्य के पहरे के साथ बेगारी की खिलाफत हुई. 1907से 1921 के काल खंड में प्रतिरोध कुली बेगार आंदोलन से उभरा. तब ब्रिटिश हुक्मरानों के सामाजिक बहिष्कार के साथ बेगार के रजिस्टर फाड़ डाले गए, सरयू नदी में बहा दिए गये. अल्मोड़ा और बागेश्वर में उभरा यह गुस्सा केवल श्रम के शोषण से नहीं बल्कि हक़-हकूक की लड़ाई का प्रतिरोध था. 1921 से 1930 के बीच वन सत्याग्रह हुआ जिसमें सीधा सवाल था जंगल किसका? लोगों का जत्था जंगल में जबरन घुस गया. दिखा-दिखा कर लकड़ी काटी गई. पशु छोड़ दिए गये., गिरफ़्तारी दी गई. यह देश का सबसे संगठित जंगल में सरकारी कब्जे के खिलाफ किया जन आंदोलन था. जिसका फैलाव तल्ला सल्ट, रानीखेत और टिहरी से हुआ. 1930 से 1940 के बीच गांव के जंगल वापस करने व लकड़ी के ठेकेदारों के खिलाफ आंदोलन चला.राजस्व अधिकारियों का बहिष्कार, वन उपज पर थोपे कर न चुकाने व डोला पालकी टैक्स न चुकाने का फैसला लिया गया.
हक-हकूक की मौजूदा हालात में वापसी का बिगुल 1973 से 1980 तक चले “चिपको आंदोलन” से बजा जिसने “जंगल हमारे हैं “की अलख जगाई. गाँवो में लकड़ी के ठेकेदारों के घुसने का विरोध हुआ और गौरा देवी के इशारे पर औरतों ने एकजुट हो सरकारी तंत्र का विरोध किया. चिपको परंपरा के साथ पर्यावरण और अपने अधिकारों को पाने की लड़ाई रही.
उपर्युक्त आंदोलनों में ब्रिटिश राज में 1931-34 के दौरान कुमाऊं के गाँवों में पहली बार सीमित वन अधिकार तो दिये गये पर वन पंचायत पर राज्य का नियंत्रण बना रहा.आजादी के बाद वन अधिकार मान्यता अधिनियम सन 2006 में पारित हुआ लेकिन पहाड़ में इसका क्रियान्वयन कमजोर रहा. हक-हुकूक पहाड़ की आत्मा थे. औपनिवेशिक कानूनों ने उन्हें अपराध बनाया और पहाड़ ने उनके लिए सबसे लम्बा शांत और वैचारिक प्रतिरोध रचा.
सामुदायिक अधिकारों के क्षरण की आर्थिक प्रतिक्रिया के साथ उभरे रोजगार के संकट ने पलायन के सिलसिले को बढ़ाये रखा. पलायन सिर्फ बेकारी से न हुआ, हक -हकूक छिनने से हुआ. पलायन विकल्प नहीं मज़बूरी है. रोजगार से पहले हक-हकूक आता है. क्या यह कहना सही है कि पहाड़ में लोग रहना नहीं चाहते? क्या यह अपमान जनक नहीं है? अनुभव सिद्ध अवलोकन यह है कि पहाड़ से अधिकार हटाए गए. भले ही वह नये राज्य की राजधानी को सुविधा संपन्न शहर में स्थापित करने का दृष्टांत हो.
पहाड़ का संकट रोजगार से पहले अधिकारों के ह्रास का संकट रहा यह केवल ऐतिहासिक भूल नहीं आज भी जारी नीतिगत विफलता है. सरकार की सबसे बड़ी चूक तो यह रही कि उसने समस्या की गलत परिभाषा दी. हर पलायन रोधी नीति इस संकल्पना से तुष्टिकरण करती रही कि पहाड़ के लोग काम नहीं करना चाहते. खेती यहाँ अप्रासंगिक हो चली है. पहाड़ में आजीविका थी उसे नीति ने तोड़ा. अब नीतिगत दबाव यह हो कि पलायन को रोजगार समस्या नहीं बल्कि आजीविका के अधिकार के संकट के रूप में परिभाषित किया जाए.
वन, चारागाह, जल और सामुदायिक भूमि के हक-हकूक पहाड़ की अर्थव्यवस्था की रीढ़ थे. आज स्थिति यह है कि वन पंचायतें हैं पर निर्णय का अधिकार नहीं है. पीआरए कानून हैं पर पहाड़ में लागू नहीं है. चारागाह हैं पर कानूनी दर्जा नहीं है. सरकार ने अधिकार के बदले अनुदान और योजना थमा दी. यह स्थायी समाधान नहीं बल्कि निर्भरता की नीति है. ऐसे में नीतिगत दबाव यह होना चाहिये कि वन पंचायतों को वैधानिक आर्थिक अधिकार दिये जाएं जो कानून द्वारा प्रदत्त अधिकार हों ठीक वैसे ही जो अक्सर भारतीय संविधान के राज्य नीति निदेशक सिद्धांत व अन्य कानूनों में मिलते हैं.
पहाड़ में “भूमि एवम वन नीति का आत्मघाती विरोधाभास “देखने को मिलता है. एक ओर सरकार कहती है कि गांव आत्मनिर्भर हों जहाँ संसाधनों का क्षरण न हो तो दूसरी ओर कृषि भूमि को गैर कृषि में बदलना आसान कर दिया गया है. बुग्याल और खर्क प्रशासनिक नियंत्रण में हैं. चराई को अपराध की तरह देखा जाता है. यह नीति नहीं संरचनात्मक पलायन प्रोत्साहन है. इस मुद्दे पर नीतिगत दबाव यह रहे कि पहाड़ी भूमि व चारागाह का गैर रूपान्तरण आजीविका क्षेत्र की तरह लिया जाय. यह ऐसा क्षेत्र रहे जहाँ जमीन के उपयोग के रुख को कृषि से गैर कृषि गतिविधियों जैसे बागवानी, पशुपालन,मत्स्य पालन, वानिकी, खनन व यहाँ तक कि होम स्टे में बदलने की अनुमति न मिले ताकि आजीविका के स्थायी साधन बने रहें और इकोतंत्र सुरक्षित रहे. तात्पर्य यह कि यह अपरिवर्तनीय आजीविका क्षेत्र हो जहाँ मुख्य ध्यान कृषि या उससे जुड़े स्थायी व्यवसायों पर होता है.
पहाड़ जहाँ से पलायन सबसे अधिक होता है वहां नीति सबसे दुर्बल है. एक सी नीति पूरे राज्य में थोपी जाती है. योजना इस आधार पर नहीं बनती कि किस क्षेत्र से कितना अधिकार छीना गया. ऐसे में नीतिगत दबाव यह हो कि हक हकूक क्षय के सूचक (एचएचडीआई) को आधिकारिक योजना उपकरण बनाया जाए और इससे बजट आवंटन को जोड़ा जाए.
क्या नीति निर्माता पहाड़ के सन्दर्भ में यह स्वीकार करते हैं कि पलायन ऐतिहासिक “अधिकार-ह्रास” का नतीजा है? वन पंचायतों को अभी तक वास्तविक अधिकार क्यों नहीं मिले? वन अधिकार एक्ट 2006 को पहाड़ में लागू करने की जिम्मेदारी किसकी है? बुग्याल और चारागाहों पर समुदाय का पहला हक कब माना जाएगा? तथा यह भी कि कि क्या राज्य सरकार पलायन पर अधिकार प्रभाव मूल्यांकन कराने को तत्पर रहेगी?
यदि सरकार सचमुच गंभीर है तो सबसे पहले वन, चारागाह, जल पर सामुदायिक स्वामित्व जैसे अधिकार बहाली पैकेज दिये जाएं. दूसरा, पहाड़ की आजीविका की पुनर्रचना की जाये अर्थात पशुपालन, कृषि-वन को एक नीति में रखा जाए. पहाड़ के उत्पादों का न्यूनतम समर्थन मूल्य व स्थानीय खरीद तंत्र को सशक्त व कारगर बनाया जाए. साथ ही पर्वतीय आजीविका व अधिकार का नियमानुसार कानूनी शक्तियों के साथ स्थापित हो.
जब तक सरकार मानती रहेगी कि पलायन विकास की कीमत है, पहाड़ खाली ही होते रहेंगे. पहाड़ को असमंजसकारी योजनाओं की नहीं बल्कि न्याय की जरुरत है. यह कहना बड़ा असहज व अपमान भरा है कि पहाड़ में लोग रहना नहीं चाहते. सच तो यह है कि पहाड़ के लोगों से उनके अधिकार हटाए गये. हक-हकूक केवल अधिकार नहीं बल्कि पहाड़ की जीवन व्यवस्था का संविधान थे. पलायन कोई विकल्प नहीं मज़बूरी था. पलायन केवल रोजगार की कमी नहीं बल्कि सामुदायिक अधिकारों के क्षरण की आर्थिक प्रतिक्रिया का नतीजा था.
पलायन इस पर्वत प्रदेश की कमजोरी नहीं था वह ब्रिटिशकालीन औपनिवेशिक नीति का परिणाम था. पलायन दो सौ साल से अधिक पुरानी संरचना थी जो क्रमिक रूप से जोर पकड़ती रही और जिसे समझे बिना आज के उत्तराखंड के विकास की गुणात्मक नीति को उभार पाना संभव भी नहीं है. अब हम आगे के परिप्रेक्षय में रणनीति बनाएँ तो हमें यह स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिये कि पहाड़ अब श्रम निर्यात परिसर नहीं रहा बल्कि जनसंख्या के अवधारण के रूप में दिखाई देता है. यह एक ऐतिहासिक सुधार है.
जारी…

जीवन भर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के कुल महाविद्यालयों में अर्थशास्त्र की प्राध्यापकी करते रहे प्रोफेसर मृगेश पाण्डे फिलहाल सेवानिवृत्ति के उपरान्त हल्द्वानी में रहते हैं. अर्थशास्त्र के अतिरिक्त फोटोग्राफी, साहसिक पर्यटन, भाषा-साहित्य, रंगमंच, सिनेमा, इतिहास और लोक पर विषदअधिकार रखने वाले मृगेश पाण्डे काफल ट्री के लिए नियमित लेखन करेंगे.
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