कैसा था नंदा देवी में गायब हुआ परमाणु डिवाइस?

नंदा देवी में गायब हुआ परमाणु डिवाइस बीसवीं शताब्दी के शीत युद्ध काल की एक गंभीर और गोपनीय घटना से जुड़ा है. यह वह समय था जब परमाणु तकनीक का उपयोग राज्यों द्वारा ऊर्जा उत्पादन, वैज्ञानिक अनुसंधान और सैन्य निगरानी के लिए किया जा रहा था. एशिया में चीन के परमाणु कार्यक्रम के विस्तार ने इस क्षेत्र को वैश्विक रणनीतिक मानचित्र पर महत्वपूर्ण बना दिया. भारत की भौगोलिक स्थिति और हिमालय की ऊँचाइयों के कारण उसे इस निगरानी व्यवस्था में विशेष स्थान मिला.

1960 के दशक में चीन द्वारा किए जा रहे परमाणु परीक्षणों की जानकारी को प्राप्त करना अमेरिका और भारत दोनों के लिए आवश्यक माना गया. उस समय उपग्रह आधारित निगरानी सीमित थी और निरंतर डेटा मिलने में कठिनाई आती थी. इस कारण ज़मीनी निगरानी उपकरणों की योजना बनाई गई. हिमालय की ऊँचाई से भूकंपीय तरंगों और रेडियो संकेतों को रिकॉर्ड करना तकनीकी दृष्टि से संभव माना गया. नंदा देवी का चयन इसी सोच के अंतर्गत हुआ.

जिस उपकरण को इस उद्देश्य के लिए तैयार किया गया, वह अमेरिका की SNAP प्रणाली का हिस्सा था. SNAP का अर्थ था Systems for Nuclear Auxiliary Power. यह प्रणाली परमाणु ऊर्जा से चलने वाले सहायक जनरेटरों के विकास पर आधारित थी. नंदा देवी अभियान में जिस इकाई को ले जाया गया, वह Radioisotope Thermoelectric Generator की श्रेणी में आती थी. इस प्रकार के जनरेटर में प्लूटोनियम-238 का प्रयोग किया जाता है.

प्लूटोनियम-238 का उपयोग परमाणु रिएक्टरों में होने वाले विखंडन के लिए नहीं किया जाता. यह रेडियोधर्मी क्षय के माध्यम से लगातार गर्मी उत्पन्न करता है. SNAP जनरेटर में इसी गर्मी को थर्मोइलेक्ट्रिक तत्वों द्वारा बिजली में परिवर्तित किया जाता था. इस प्रक्रिया में कोई यांत्रिक गति नहीं होती थी. परिणामस्वरूप यह प्रणाली अत्यधिक स्थिर और लम्बे समय तक संचालन के लिए उपयुक्त थी.

इस जनरेटर से प्राप्त बिजली एक स्वचालित निगरानी स्टेशन को दी जानी थी. इस स्टेशन में भूकंपीय सेंसर लगाए गए थे, जो दूर स्थित भूमिगत परमाणु परीक्षणों से उत्पन्न कंपन को दर्ज कर सकते थे. इसके साथ रेडियो सिग्नल ग्रहण करने वाले उपकरण भी जुड़े थे, जिनका उद्देश्य मिसाइल और सैन्य संचार से संबंधित संकेतों का संग्रह करना था. नंदा देवी की ऊँचाई और स्थिति के कारण तिब्बत क्षेत्र से जुड़े संकेतों को दर्ज करना संभव माना गया.

1965 में इस योजना के अंतर्गत एक संयुक्त पर्वतारोहण अभियान शुरू किया गया. दल उपकरणों को ऊँचाई तक ले जाने में सफल रहा, परंतु अचानक मौसम में तीव्र बदलाव आ गया. भारी हिमपात और हिमस्खलन की आशंका ने आगे बढ़ना असंभव बना दिया. दल को पीछे लौटने का निर्णय लेना पड़ा. SNAP जनरेटर अत्यधिक भारी और संवेदनशील था. उसे सुरक्षित रूप से नीचे लाना उस स्थिति में संभव नहीं रहा. उपकरण को वहीं सुरक्षित बाँध कर छोड़ा गया.

इसके बाद उस स्थान तक दोबारा पहुँचना कभी संभव नहीं हुआ. आधिकारिक विवरणों में यह कहा गया कि उपकरण हिमस्खलन में दब गया. इसके आगे की जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं कराई गई.

SNAP जैसे परमाणु जनरेटरों का उपयोग उस समय पृथ्वी और अंतरिक्ष दोनों में किया जा रहा था. ध्रुवीय अनुसंधान केंद्रों, समुद्र के भीतर लगे सेंसरों और दूरस्थ सैन्य निगरानी प्रणालियों में इसी तकनीक का प्रयोग हुआ. अंतरिक्ष अभियानों में यह तकनीक विशेष रूप से उपयोगी सिद्ध हुई, क्योंकि यह लंबे समय तक बिना किसी ईंधन आपूर्ति के ऊर्जा प्रदान कर सकती थी.

इस उपकरण की लागत अत्यंत अधिक थी. प्लूटोनियम-238 का उत्पादन सीमित और जटिल प्रक्रिया से होता है. 1960 के दशक में एक SNAP जनरेटर की कीमत कई मिलियन डॉलर आँकी जाती थी. वर्तमान मूल्यों के अनुसार यह राशि सैकड़ों करोड़ रुपये के बराबर बैठती है. इसमें केवल सामग्री की लागत नहीं, बल्कि अनुसंधान, निर्माण, परमाणु सुरक्षा, परिवहन और गोपनीय संचालन की लागत भी शामिल होती है.

इसी आर्थिक और तकनीकी मूल्य के कारण यह प्रश्न उठता रहा है कि क्या इस उपकरण को वास्तव में हमेशा के लिए छोड़ दिया गया. कई विशेषज्ञों का मानना है कि बाद के वर्षों में इसे निकाल लिया गया. सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय समझौतों के कारण इस संबंध में सार्वजनिक घोषणा नहीं की गई. इस विषय में कोई आधिकारिक दस्तावेज आज तक उपलब्ध नहीं है.

पर्यावरण से जुड़ी चिंताएँ भी इस घटना से जुड़ी रहीं. प्लूटोनियम एक अत्यंत विषैला रेडियोधर्मी तत्व है. नंदा देवी क्षेत्र हिमनदों का उद्गम स्थल है. इन हिमनदों से निकलने वाली नदियाँ बड़े भूभाग को जल प्रदान करती हैं. इस कारण वैज्ञानिकों ने संभावित प्रदूषण की आशंका व्यक्त की. अब तक किसी प्रत्यक्ष क्षति का प्रमाण नहीं मिला है, पर यह विषय शोध और बहस का केंद्र बना हुआ है.

नंदा देवी में खोया SNAP परमाणु जनरेटर तकनीकी महत्व, अंतरराष्ट्रीय राजनीति और हिमालय की भौगोलिक चुनौती का एक साथ उपस्थित उदाहरण है. यह घटना दर्शाती है कि आधुनिक तकनीक किस प्रकार दुर्गम प्राकृतिक क्षेत्रों तक पहुँची और किस प्रकार वही प्रकृति उसे सीमित करने में सक्षम रही. इस उपकरण का वास्तविक हश्र आज भी अज्ञात है, और यही तथ्य इसे आधुनिक इतिहास की एक स्थायी पहेली बना देता है.

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