हैडलाइन्स

प्रो. डीआर पुरोहित को लोक रंगमंच और लोक संगीत के क्षेत्र में राष्ट्रीय संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार

नाटक लिखने और मंचित करने वालों की सूची तो बहुत लम्बी है पर नाटक को जीने वालों की सूची में पहला नाम, जो मुझे सूझता है वह डी.आर. पुरोहित का ही है. नाटक उनके बचपन का पसंदीदा खेल था, नाटक को ही उच्च अध्ययन (शोध) का विषय बनाया और नाटक ही अध्यापन का प्रमुख विषय. जुनून की हद तक की ये पसंद निखर कर उनकी विशेषज्ञता कुछ इस तरह बन गयी कि नाटक और डीआर पुरोहित एक-दूसरे के पर्याय-से हो गये.
(Professor D. R. Purohit)

नाटक शब्द पहले अनुच्छेद में जहाँ भी प्रयोग किया गया है, उसमें लोक अंतर्निहित है. गढ़वाल के लोक-नाट्य में प्राण-प्रतिष्ठा करने, आधुनिक रंगमंचानुकूल बनाने और उसे अकादमिक स्वीकार्यता प्रदान करवाने के इसी महत्वपूर्ण योगदान के लिए डी.आर. पुरोहित का नाम प्रतिष्ठित संगीत नाटक अकादमी अवार्ड के लिए चुना गया है. इस घोषणा से उत्तराखण्ड का हर ढोल अपने अंदर एक गूँज महसूस कर रहा है जिसकी प्रतिगूँज सूदूर-पहाड़ी पाखों से भी सुनायी दे रही है.
(Professor D. R. Purohit)

यूनिवर्सिटी में अंग्रेजी पढ़ाने वाले डीआर पुरोहित का व्यक्तित्व सेंस ऑफ ह्यूमर से लबालब भरा हुआ है. बड़ी सहजता से अपने को ही किरदार बना कर हँसना कोई उनसे सीखे. सारे प्रोफेसर इस चिंता में दुबले हुए जाते हैं कि किसी तरह गम्भीर दिखें और इसके लिए कभी दाढ़ी बढ़ा लेते हैं, कभी बाल और चश्मे में भले ही लैंस न हो काँच ही हो, पर होगा मोटा सा. दूसरी तरफ इन प्रोफेसर साहब को जब मैं उनके विभाग की कुर्सी पर बैठे हुए, कैमरे में कैद कर रहा था वो मंद-मंद मुस्करा कर कह रहे थे – इतना इंट्रोवर्ट मैं हूँ नहीं जितना इस चश्मे की वजह से लगता हूँ. बैकग्राउंड में शेक्सपियर के बाद के सबसे चर्चित और लोकप्रिय नाटककार ऑस्कर वाइल्ड का सुप्रसिद्ध उद्धरण दिख रहा था जिसे गढ़वाली लोकनाट्य के प्रतीक-चिह्न मुखौटा-द्वय के चित्रांकन से उत्तराखण्ड के परिपेक्ष्य में कस्टमाइज कर दिया गया था. ऑस्कर वाइल्ड का फोटो में दिखने वाला ये उद्धरण इस तरह है –

I regard the theatre as the greatest of all art forms, the most immediate way in which a human being can share with another the sense of what it is to be a human being…

एक बार मैंने पुरोहित सर से फोन पर कहा कि अपने बारे में कुछ बताएँ तो उन्होंने हँसते हुए टालने के अंदाज़ में कहा कि मेरे प्रोफेसर साथी अभिवादन के साथ अक्सर चुटकी लेते हैं कि, और डॉक्टर साहब आजकल कहाँ बज रहा है आपका ढोल. प्रसिद्ध कवि मंगलेश डबराल ने केशव अनुरागी की विशेषज्ञता से गदगद् होकर कविता लिखी थी कि वो ढोल के अंदर रहता है. इसी तर्ज़ पर पर कह सकते हैं कि डीआर पुरोहित ढोल के आसपास रहते हैं. ढोल अर्थात् लोकसंस्कृति का मूर्त प्रतीक.

कई बार आग्रह करने पर डी.आर. पुरोहित ने अपना जो सीवी भेजा उसे समझने और आत्मसात करने में ही एक हफ्ते से अधिक का समय लगा. उसमें जो कुछ लिखा है वो संक्षेप में ये कि 16 से अधिक महत्वपूर्ण संस्थानों की सदस्यता और सहभागिता है उनके पास, 20 से अधिक संस्थाओं के लिए थियेटर-म्यूजिक निर्माण में सहभागिता की है उन्होंने, 36 थियेटर स्क्रिप्ट लिखी हैं उन्होंने, 25 नाटकों में अभिनय किया है, 50 से अधिक बार नाटकों का निर्देशन कर चुके हैं और दर्जन से अधिक डॉक्यूमेंट्रीज़-फिल्म्स में निर्देशक या सलाहकार के रूप में रहे हैं. जो बात इसमें लिखी नहीं गयी थी वो ये कि उन्होंने हजारों शागिर्दों को नाटक की लत लगायी है और अपने समाज को अपनी लोकसंस्कृति की क़ीमत समझायी है.    

विश्व में डी.आर. पुरोहित की पहचान अकेडमिक गेटवे ऑफ गढ़वाल फोक-थियेटर के रूप में है. संगीत नाटक अकादमी अवार्ड आपको प्राप्त होने से स्वदेश की भी प्रतिष्ठित मुहर लग गयी है. हम सब हर्षित हैं, गौरवान्वित हैं.
(Professor D. R. Purohit)

देवेश जोशी 

1 अगस्त 1967 को जन्मे देवेश जोशी फिलहाल राजकीय इण्टरमीडिएट काॅलेज में प्रवक्ता हैं. उनकी प्रकाशित पुस्तकें है: जिंदा रहेंगी यात्राएँ (संपादन, पहाड़ नैनीताल से प्रकाशित), उत्तरांचल स्वप्निल पर्वत प्रदेश (संपादन, गोपेश्वर से प्रकाशित), शोध-पुस्तिका कैप्टन धूम सिंह चौहान और घुघती ना बास (लेख संग्रह विनसर देहरादून से प्रकाशित). उनके दो कविता संग्रह – घाम-बरखा-छैल, गाणि गिणी गीणि धरीं भी छपे हैं. वे एक दर्जन से अधिक विभागीय पत्रिकाओं में लेखन-सम्पादन और आकाशवाणी नजीबाबाद से गीत-कविता का प्रसारण कर चुके हैं. 

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