Featured

सिनेमा : रोशनदान से दिखता घर का सपना

इटली में 1901 में पैदा हुए फिल्मकार वित्तोरियो डी सिका यथार्थवादी सिनेमा के उस्ताद हैं. यह कहना अतिश्योक्ति न होगी कि वे फ़िल्मकारों के फिल्मकार हैं. खुद हमारे देश के तीन बड़े फ़िल्मकारों –सत्यजित राय, राजकपूर और बिमल राय, पर उनका सीधा प्रभाव पड़ा. राजकपूर तो डी सिका से इतना प्रभावित थे कि उनकी ‘शू शाइन’ का भारतीयकरण करते हुए उसका नाम भी ‘बूट पॉलिश’ दे डाला.

यह सही है कि डी सिका की ख्याति एक साइकिल चोर की कहानी के इर्द–गिर्द इटली के पस्त समाज की कहानी कहती ‘बाइसिकिल थीव्स’ से ज्यादा है. लेकिन सच यह भी है कि उन्होंने और भी जरूरी फिल्में बनाईं हैं. ऐसी ही एक मजेदार और जरुरी फ़िल्म है 1956 में बनी ‘द रूफ़’ यानि एक छत या आशियाँ की कहानी. इस फ़िल्म का प्लाट भी आर्थिक मंदी की मार से पस्त हुए इटली के समाज का है. किसी तरह से लोग गुजर–बसर कर रहे हैं.

कहानी एक ऐसे संयुक्त परिवार की है जिनके पास बहुत सारे लोगों के रहने के लिए एक ही बड़ा कमरा है. तंगहाली ने सारी निजताओं को सपना बना दिया है. ऐसे में उस परिवार के नवयुवक की शादी होती है और उसका शुरुआती रोमांस भी घरेलू चौराहे में घटता है. अपने रोमांस और निजता की रक्षा के लिए नवयुवक अपने दोस्तों के साथ अपने लिए एक घरौंदे का जुगाड़ करता है. वह हर रात अपने माल–असबाब के साथ एक छोटे ट्रक पर सवार होकर गैर कानूनी जगहों में घरौंदा बनाने की कोशिश करते हैं. रात के अँधेरे में शुरू हुई उनकी हर कोशिश नाकाम हो जाती है क्योंकि हर बार सुबह छत पूरी होने से पहले म्युनिसिपलिटी के लोग पुलिस के साथ आ धमकते और अधबने गैर क़ानूनी ढाँचे को निरस्त कर देते हैं.

गैर क़ानूनी ढाँचे को क़ानूनी बनाने में एक ही अड़चन थी, छत को म्युनिसिपलिटी के आने से पहले पूरा करना. फ़िल्म के अंतिम दृश्य रचना में युवाओं की टोली इस बार पूरे उत्साह से घर बनाती है. सुबह होते–होते इस बार घर लगभग पूरा हो जाता है, म्युनिसिपलिटी के लोग इस बार फिर जैसे ही छत के पूरे न होने के लिए एक छोटे वर्गाकार की तरफ की इशारा करते हैं तो एक अद्भुत मज़ाक के तौर पर फ़िल्म का नायक कहता है वह तो अपना ‘रोशनदान’ है और इस बार गैरकानूनी ढांचा क़ानूनी साबित होकर दर्शकों को भी खूब सारा सुकून देता है.

संजय जोशी पिछले तकरीबन दो दशकों से बेहतर सिनेमा के प्रचार-प्रसार के लिए प्रयत्नरत हैं. उनकी संस्था ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ पारम्परिक सिनेमाई कुलीनता के विरोध में उठने वाली एक अनूठी आवाज़ है जिसने फिल्म समारोहों को महानगरों की चकाचौंध से दूर छोटे-छोटे कस्बों तक पहुंचा दिया है. इसके अलावा संजय साहित्यिक प्रकाशन नवारुण के भी कर्ताधर्ता हैं.

काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री

काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें

Sudhir Kumar

Recent Posts

बजट में युवाओं के लिए योजना का ढोल है पर उसकी गमक गुम है

उत्तराखंड के आय व्यय लेखे 2026-27 को समझते हुए यह आशंका उभरती है की क्या…

5 days ago

जापान में आज भी इस्तेमाल होती है यह प्राचीन भारतीय लिपि

भाषाओं का इतिहास हमेशा रोचक रहा है. दुनिया की कई भाषाओं में ऐसे शब्द मिलते…

5 days ago

आज है उत्तराखंड का लोकपर्व ‘फूलदेई’

उत्तराखंड को केवल 'देवभूमि' ही नहीं, बल्कि उत्सवों की भूमि कहना भी बिल्कुल सटीक होगा. यहाँ साल भर…

5 days ago

द्वी दिना का ड्यार शेरुवा यौ दुनीं में : अलविदा, दीवान दा

‘यौ डाना कौ पारा, देख्यूंछ न्यारा-न्यारा’ दीवान सिंह कनवाल की आवाज़ में ये गीत पहली कुमाऊनी फ़िल्म…

1 week ago

हिमालय को समझे बिना उसे शासित नहीं किया जा सकता

कुमाऊं-गढ़वाल हिमालयी क्षेत्र के लिए भिन्न प्रशासन, विशेष नीति या मैदानी भागों से भिन्न व्यवस्था…

1 week ago

पहाड़ों का एक सच्चा मित्र चला गया

बीते दिन सुबह लगभग चार बजे एक ऐसी खबर आई जिसने कौसानी और लक्ष्मी आश्रम…

1 week ago