प्योर मैथमैटिक्स का रोमांस
अट्ठारह साल के एक नौजवान ने अपने पिता को लिखे पत्र में बड़े उत्साह से अपने रिसर्च टॉपिक के बारे में बताया. जवाब में भेजी गई चिट्ठी में पिता ने लिखा- मेरे बेटे, समानांतर रेखाओं के फेरे में तो... Read more
साझा कलम : 11 प्रीति सिंह परिहार
[एक ज़रूरी पहल के तौर पर हम अपने पाठकों से काफल ट्री के लिए उनका गद्य लेखन भी आमंत्रित कर रहे हैं. अपने गाँव, शहर, कस्बे या परिवार की किसी अन्तरंग और आवश्यक स्मृति को विषय बना कर आप चार सौ से... Read more
हल्द्वानी के इतिहास के विस्मृत पन्ने – 20
आजादी की लड़ाई में बहुत बड़ा योगदान देने वालों और बाद में क्षेत्र का नेतृत्व करने वालों के सम्बंध में कुछ खरी-खरी कहना उनके सम्मान में कमी लाना नहीं है. बल्कि यह बताना है कि राजनीति में यह सब... Read more
आलोक धन्वा – जिसकी दुनिया रोज़ बनती है!
आलोक धन्वा – जिसकी दुनिया रोज़ बनती है -शिरीष मौर्य हर उस आदमी की एक नहीं कई प्रिय पुस्तकें होती हैं, जो किताबों की दुनिया में रहता है. मैं भी किसी हद तक इस दुनिया में रहता हूँ और ऐसी... Read more
‘सब हो जायेगा’ वाले भाई साहब
‘चिंता मत करो, सब हो जायेगा !’ की तसल्ली देने वाले भाई लोगों की तादाद इन दिनों एकाएक काफी बढ़ चुकी है. जिसे देखो वो तसल्ली, भरोसा और आश्वासन जबान में लिए फिरता है. और जैसे ही कोई... Read more
नैनीताल पहुंची ‘जन संवाद यात्रा’
नवम्बर 2000 में पृथक उत्तराखंड राज्य के अस्तित्व में आने के बाद 18 साल गुजर चुके हैं, ऐसा कहा जा रहा है कि राज्य अब किशोरावस्था से युवावस्था की तरफ बढ़ चुका है. इन 18 सालों में राज्य बनने के... Read more
ट्रेल पास अभियान भाग – 5
पिछली कड़ी पिण्डारी कांठा में चार दिन पांच अक्टूबर के प्रातः ही चाय के पश्चात् चन्दोल, तेवारी, शाहजी और कीर्तिचन्द दो कुलियों को साथ लेकर आगे निकल गये. ग्यारह बजे हमने भी प्रस्थान किया. तख्ता... Read more
कुमाऊंनी लोकगीतों में सामाजिक चित्रण भाग – 2
पिछली कड़ी विवाहोपरान्त पुत्री की विदाई सर्वत्र करूण होती है. वह मां की दुलारी है, जिसने उसे पालपोस कर बड़ा किया, उपयुक्त गृहिणी के सभी गुण लाने का प्रयास किया है. किन्तु आज वह वृ़द्धा भी अपने... Read more
बहुत कम समय भी रहता है देर तक
मन का गद्य -शिवप्रसाद जोशी एक हल्की सी ख़ुशी की आहट थी. लेकिन जल्द ही ये आवाज़ गुम हो गई. फिर देर तक एक बेचैनी बन गई. जैसे उस ख़ुशी को समझने का यत्न करती हुई. क्यों थी वो. क्या थी वो. बेचैनी... Read more
जैसे कोई कीमती चीज सदा के लिए मिट्टी में मिल गई हो
इक नग़मा है पहलू में बजता हुआ – शंभू राणा करीब पांचेक साल बीत गए सतीश को गुजरे हुए. वह मेरा बालसखा था और इस शहर में बनने वाला पहला दोस्त भी. करीब पैंतीस-छत्तीस साल पहले जब हम पहली बार म... Read more





















